हि

अध्याय 2 · 16 / 71

2.16

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ॥ १६ ॥

न—कभी नहीं; असतः—असत् का; विद्यते—है; भावः—स्थायित्व; न—कभी नहीं; अभावः—परिवर्तनशील गुण; विद्यते—है; सतः—नित्य का; उभयोः—दोनों का; अपि—निश्चय ही; दृष्टः—देखा गया; अन्तः—निष्कर्ष; तु—किन्तु; अनयोः—इनका; तत्त्व—सत्य; दर्शिभिः—द्रष्टाओं द्वारा।

जो तत्त्व के द्रष्टा हैं, उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला है कि असत् का कोई स्थायित्व नहीं है और सत् का कोई विनाश नहीं है। यह निष्कर्ष द्रष्टाओं ने दोनों की प्रकृति का अध्ययन करके निकाला है।

परिवर्तनशील शरीर का कोई स्थायित्व नहीं है। आधुनिक चिकित्सा-विज्ञान यह स्वीकार करता है कि विभिन्न कोशिकाओं की क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं के द्वारा शरीर प्रत्येक क्षण परिवर्तित हो रहा है; और इस प्रकार शरीर में वृद्धि तथा वार्धक्य घटित होते हैं। किन्तु आत्मा नित्य रूप से विद्यमान रहती है, और शरीर तथा मन के समस्त परिवर्तनों के बावजूद वही की वही बनी रहती है। पदार्थ और आत्मा में यही अन्तर है। स्वभाव से शरीर सदा परिवर्तनशील है, और आत्मा नित्य है। यह निष्कर्ष तत्त्व के समस्त वर्गों के द्रष्टाओं द्वारा, चाहे वे निर्विशेषवादी हों या साकारवादी, स्थापित किया गया है। विष्णु पुराण में कहा गया है कि विष्णु तथा उनके धाम सभी स्वयं-प्रकाशित आध्यात्मिक अस्तित्व वाले हैं। “ज्योतींषि विष्णुर्भवनानि विष्णुः।” सत् और असत् शब्द केवल आत्मा और पदार्थ की ओर संकेत करते हैं। समस्त तत्त्वद्रष्टाओं का यही कथन है।

यह उन जीवों के प्रति भगवान् के उपदेश का आरम्भ है, जो अज्ञान के प्रभाव से मोहित हैं। अज्ञान को दूर करने में उपासक और उपास्य के बीच नित्य सम्बन्ध की पुनर्स्थापना तथा अंशस्वरूप जीवों और पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के बीच के अन्तर की तदनुरूप समझ निहित है। मनुष्य स्वयं के गहन अध्ययन से परम तत्त्व की प्रकृति को समझ सकता है, क्योंकि स्वयं और परम के बीच का अन्तर अंश और पूर्ण के सम्बन्ध के रूप में समझा जाता है। वेदान्त-सूत्र में, तथा श्रीमद्भागवत में भी, परम तत्त्व को समस्त उद्भवों का मूल स्वीकार किया गया है। ऐसे उद्भव उच्च और निम्न प्राकृतिक क्रमों के द्वारा अनुभव किए जाते हैं। जीव उच्चतर प्रकृति से सम्बन्ध रखते हैं, जैसा कि सप्तम अध्याय में प्रकट होगा। यद्यपि ऊर्जा और ऊर्जावान् में कोई अन्तर नहीं है, तथापि ऊर्जावान् को परम स्वीकार किया जाता है, और ऊर्जा या प्रकृति को अधीनस्थ स्वीकार किया जाता है। अतः जीव सदा परमेश्वर के अधीन रहते हैं, जैसे स्वामी और सेवक के, अथवा शिक्षक और शिष्य के सम्बन्ध में होता है। ऐसा स्पष्ट ज्ञान अज्ञान के प्रभाव में समझना असम्भव है, और ऐसे अज्ञान को दूर करने के लिए भगवान् सर्वकाल के समस्त जीवों के प्रबोधन हेतु भगवद्गीता का उपदेश देते हैं।