हि

अध्याय 2 · 18 / 71

2.18

अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ॥ १८ ॥

अन्तवन्तः—नश्वर; इमे—ये सब; देहाः—भौतिक शरीर; नित्यस्य—नित्य अस्तित्व वाले का; उक्ताः—ऐसा कहा गया है; शरीरिणः—देहधारी आत्माओं का; अनाशिनः—कभी नष्ट न होने वाले; अप्रमेयस्य—अप्रमेय का; तस्मात्—अतः; युध्यस्व—युद्ध करो; भारत—हे भरतवंशी।

अविनाशी, अप्रमेय और नित्य जीव का केवल भौतिक शरीर ही विनाश के अधीन है; अतः हे भरतवंशी, युद्ध करो।

भौतिक शरीर स्वभाव से नश्वर है। यह तत्काल नष्ट हो सकता है, अथवा सौ वर्ष पश्चात्। यह केवल समय का प्रश्न है। इसे अनिश्चित काल तक बनाए रखने की कोई सम्भावना नहीं है। किन्तु आत्मा इतनी सूक्ष्म है कि शत्रु उसे देख तक नहीं सकता, मार देने की तो बात ही दूर है। जैसा पिछले श्लोक में उल्लेख किया गया, वह इतनी सूक्ष्म है कि कोई भी यह कल्पना नहीं कर सकता कि उसके परिमाण को कैसे मापा जाए। अतः दोनों ही दृष्टियों से शोक का कोई कारण नहीं है, क्योंकि जीव जैसा है वैसा न तो मारा जा सकता है, और न ही भौतिक शरीर, जो किसी भी अवधि तक नहीं बचाया जा सकता, स्थायी रूप से रक्षित किया जा सकता है। पूर्ण आत्मा का सूक्ष्म कण अपने कर्म के अनुसार यह भौतिक शरीर प्राप्त करता है, और अतः धार्मिक सिद्धान्तों का पालन उपयोग में लाया जाना चाहिए। वेदान्त-सूत्र में जीव को प्रकाश के रूप में वर्णित किया गया है, क्योंकि वह परम प्रकाश का अंश है। जैसे सूर्य-प्रकाश सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का पालन करता है, वैसे ही आत्मा का प्रकाश इस भौतिक शरीर का पालन करता है। ज्यों ही आत्मा इस भौतिक शरीर से बाहर हो जाती है, त्यों ही शरीर सड़ने लगता है; अतः यह आत्मा ही है जो इस शरीर का पालन करती है। शरीर स्वयं में महत्त्वहीन है। अर्जुन को परामर्श दिया गया कि वे धर्म के निमित्त युद्ध करें और भौतिक शरीर का बलिदान करें।