हि

अध्याय 2 · 19 / 71

2.19

य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् ।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥ १९ ॥

यः—जो कोई; एनम्—इस; वेत्ति—जानता है; हन्तारम्—मारने वाला; यः—जो कोई; च—भी; एनम्—इस; मन्यते—मानता है; हतम्—मारा गया; उभौ—दोनों; तौ—वे; न—कभी नहीं; विजानीतः—ज्ञान में; न—कभी नहीं; अयम्—यह; हन्ति—मारता है; न—न ही; हन्यते—मारा जाता है।

जो यह मानता है कि जीव मारने वाला है अथवा वह मारा जाता है, वह नहीं समझता। जो ज्ञान में स्थित है, वह जानता है कि आत्मा न तो मारती है और न ही मारी जाती है।

जब देहधारी जीव घातक शस्त्रों से आहत होता है, तब यह जानना चाहिए कि शरीर के भीतर का जीव नहीं मारा जाता। आत्मा इतनी सूक्ष्म है कि किसी भी भौतिक शस्त्र से उसे मारना असम्भव है, जैसा कि पूर्ववर्ती श्लोकों से स्पष्ट है। अपने आध्यात्मिक संगठन के कारण भी जीव वध्य नहीं है। जो मारा जाता है, अथवा जिसके मारे जाने की कल्पना की जाती है, वह केवल शरीर है। तथापि इससे शरीर के वध को किंचित् भी प्रोत्साहन नहीं मिलता। वैदिक विधान है, “माहिंस्यात् सर्व-भूतानि”—किसी के प्रति कभी हिंसा न करो। यह समझ कि जीव नहीं मारा जाता, पशुवध को भी प्रोत्साहन नहीं देती। बिना अधिकार के किसी का शरीर मारना घृणित है और राज्य के नियम तथा भगवान् के नियम दोनों के द्वारा दण्डनीय है। तथापि अर्जुन को धर्म के सिद्धान्त के लिए मारने में प्रवृत्त किया जा रहा है, न कि मनमाने रूप से।