अध्याय 2 · 20 / 71
2.20
न जायते म्रियते वा कदाचि-
न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ २० ॥
न—कभी नहीं; जायते—जन्म लेती है; म्रियते—कभी नहीं मरती; वा—अथवा; कदाचित्—किसी भी काल में (भूत, वर्तमान या भविष्य); न—कभी नहीं; अयम्—यह; भूत्वा—होकर; भविता—होगी; वा—या; न—नहीं; भूयः—अथवा हुई है; अजः—अजन्मा; नित्यः—नित्य; शाश्वतः—शाश्वत; अयम्—यह; पुराणः—सबसे पुरातन; न—कभी नहीं; हन्यते—मारी जाती है; हन्यमाने—मारे जाने पर; शरीरे—शरीर के।
आत्मा का न तो कभी जन्म होता है और न मृत्यु। न ही वह एक बार होकर पुनः अस्तित्व से रहित होती है। वह अजन्मा, नित्य, सदा-विद्यमान, अमर और पुरातन है। शरीर के मारे जाने पर भी वह नहीं मारी जाती।
गुणात्मक रूप से परम आत्मा का सूक्ष्म अणु-रूप अंश परम के साथ एक है। वह शरीर के समान किसी परिवर्तन से नहीं गुज़रती। कभी-कभी आत्मा को स्थिर, अथवा कूटस्थ कहा जाता है। शरीर छह प्रकार के रूपान्तरणों के अधीन है। यह माता के शरीर के गर्भ में जन्म लेता है, कुछ काल तक रहता है, बढ़ता है, कुछ प्रभाव उत्पन्न करता है, क्रमशः क्षीण होता है, और अन्ततः विस्मृति में विलीन हो जाता है। किन्तु आत्मा ऐसे परिवर्तनों से नहीं गुज़रती। आत्मा जन्म नहीं लेती, अपितु, चूँकि वह भौतिक शरीर धारण करती है, अतः शरीर जन्म लेता है। आत्मा वहाँ जन्म नहीं लेती, और आत्मा मरती नहीं। जिस वस्तु का जन्म होता है, उसकी मृत्यु भी होती है। और चूँकि आत्मा का जन्म नहीं होता, अतः उसका न भूत है, न वर्तमान, न भविष्य। वह नित्य, सदा-विद्यमान और पुरातन है—अर्थात्, इतिहास में उसके अस्तित्व में आने का कोई चिह्न नहीं है। शरीर के प्रभाव से हम आत्मा के जन्म आदि का इतिहास खोजते हैं। आत्मा किसी भी काल में शरीर के समान वृद्ध नहीं होती। अतः तथाकथित वृद्ध मनुष्य भी स्वयं को उसी आत्मा में अनुभव करता है, जैसा वह अपने बाल्यकाल अथवा यौवन में था। शरीर के परिवर्तन आत्मा को प्रभावित नहीं करते। आत्मा वृक्ष के समान, अथवा किसी भौतिक वस्तु के समान, क्षीण नहीं होती। आत्मा का कोई उपोत्पाद भी नहीं है। शरीर के उपोत्पाद, अर्थात् सन्तान, भी भिन्न व्यक्तिगत आत्माएँ हैं; और, शरीर के कारण, वे किसी विशेष मनुष्य की सन्तान के रूप में प्रतीत होती हैं। शरीर आत्मा की उपस्थिति के कारण विकसित होता है, किन्तु आत्मा की न तो कोई शाखाएँ हैं और न परिवर्तन। अतः आत्मा शरीर के छह परिवर्तनों से मुक्त है।
कठ उपनिषद् में भी हमें एक समान अंश मिलता है, जो इस प्रकार है:
na jāyate mriyate vā vipaścin
nāyaṁ kutaścin na vibhūva kaścit
ajo nityaḥ śāśvato ‘yaṁ purāṇo
na hanyate hanyamāne śarīre.
(कठ 1.2.18)
इस श्लोक का अर्थ और तात्पर्य वही है जो भगवद्गीता में है, किन्तु यहाँ इस श्लोक में एक विशेष शब्द है, विपश्चित्, जिसका अर्थ है विद्वान् अथवा ज्ञानयुक्त।
आत्मा ज्ञान से परिपूर्ण है, अथवा सदा चेतना से परिपूर्ण है। अतः चेतना आत्मा का लक्षण है। यदि कोई हृदय के भीतर, जहाँ वह स्थित है, आत्मा को न भी पाए, तब भी वह केवल चेतना की उपस्थिति से ही आत्मा की उपस्थिति को समझ सकता है। कभी-कभी बादलों के कारण, अथवा किसी अन्य कारण से, हम आकाश में सूर्य को नहीं देख पाते, किन्तु सूर्य का प्रकाश सदा वहाँ रहता है, और हम आश्वस्त रहते हैं कि अतः दिन है। प्रातःकाल आकाश में ज्यों ही थोड़ा-सा प्रकाश होता है, हम समझ जाते हैं कि सूर्य आकाश में है। इसी प्रकार, चूँकि समस्त शरीरों में—चाहे मनुष्य हो या पशु—कुछ चेतना है, अतः हम आत्मा की उपस्थिति को समझ सकते हैं। तथापि आत्मा की यह चेतना परम की चेतना से भिन्न है, क्योंकि परम चेतना सर्वज्ञ है—भूत, वर्तमान और भविष्य की ज्ञाता। व्यक्तिगत आत्मा की चेतना विस्मृति की ओर प्रवृत्त रहती है। जब वह अपने वास्तविक स्वरूप को विस्मृत कर देती है, तब उसे श्रीकृष्ण के श्रेष्ठ उपदेशों से शिक्षा और प्रबोधन प्राप्त होता है। किन्तु श्रीकृष्ण विस्मरणशील आत्मा के समान नहीं हैं। यदि ऐसा होता, तो भगवद्गीता के उनके उपदेश व्यर्थ हो जाते।
आत्माएँ दो प्रकार की हैं—अर्थात् सूक्ष्म अणु-रूप आत्मा (अणु-आत्मा) और परमात्मा (विभु-आत्मा)। इसकी पुष्टि कठ उपनिषद् में इस प्रकार भी होती है:
aṇor aṇīyān mahato mahīyān
ātmāsya jantor nihito guhāyām
tam akratuḥ paśyati vīta-śoko
dhātuḥ prasādān mahimānam ātmanaḥ
(कठ 1.2.20)
“परमात्मा [परमात्मा] और अणु-रूप आत्मा [जीवात्मा] दोनों जीव के शरीर रूपी एक ही वृक्ष पर, एक ही हृदय के भीतर स्थित हैं, और केवल वही, जो समस्त भौतिक इच्छाओं तथा शोकों से मुक्त हो गया है, परम की कृपा से आत्मा की महिमा को समझ सकता है।” श्रीकृष्ण परमात्मा के भी उद्गम हैं, जैसा कि आगे के अध्यायों में प्रकट होगा, और अर्जुन अणु-रूप आत्मा हैं, जो अपने वास्तविक स्वरूप को विस्मृत किए हुए हैं; अतः उन्हें श्रीकृष्ण द्वारा, अथवा उनके प्रामाणिक प्रतिनिधि (आध्यात्मिक गुरु) द्वारा प्रबोधित किए जाने की आवश्यकता है।