हि

अध्याय 2 · 21 / 71

2.21

वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् ।
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥ २१ ॥

वेद—ज्ञान में; अविनाशिनम्—अविनाशी; नित्यम्—सदा; यः—जो; एनम्—इस (आत्मा को); अजम्—अजन्मा; अव्ययम्—अपरिवर्तनशील; कथम्—कैसे; सः—वह; पुरुषः—पुरुष; पार्थ—हे पार्थ (अर्जुन); कम्—किसको; घातयति—आहत करता है; हन्ति—मारता है; कम्—किसको।

हे पार्थ, जो पुरुष यह जानता है कि आत्मा अविनाशी, अजन्मा, नित्य और अपरिवर्तनशील है, वह किसी को कैसे मार सकता है अथवा किसी से मरवा सकता है?

प्रत्येक वस्तु की अपनी समुचित उपयोगिता है, और जो मनुष्य पूर्ण ज्ञान में स्थित है, वह जानता है कि किसी वस्तु का उसकी समुचित उपयोगिता के लिए कैसे और कहाँ प्रयोग किया जाए। इसी प्रकार हिंसा की भी अपनी उपयोगिता है, और हिंसा का प्रयोग कैसे किया जाए, यह ज्ञानवान् पुरुष पर निर्भर करता है। यद्यपि न्यायाधीश हत्या के लिए दोषी ठहराए गए व्यक्ति को मृत्युदण्ड देता है, तथापि न्यायाधीश पर दोष नहीं लगाया जा सकता, क्योंकि वह न्याय की संहिता के अनुसार ही दूसरे व्यक्ति के विरुद्ध हिंसा का आदेश देता है। मनुष्यजाति के विधि-ग्रन्थ मनु-संहिता में यह समर्थित है कि हत्यारे को मृत्युदण्ड दिया जाना चाहिए, ताकि उसे अपने अगले जीवन में उस महान् पाप के लिए कष्ट न भोगना पड़े जो उसने किया है। अतः राजा द्वारा हत्यारे को फाँसी देने का दण्ड वस्तुतः लाभकारी है। इसी प्रकार जब श्रीकृष्ण युद्ध का आदेश देते हैं, तो यह निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए कि हिंसा परम न्याय के लिए है, और इस रूप में अर्जुन को उपदेश का पालन करना चाहिए, यह भली-भाँति जानते हुए कि श्रीकृष्ण के लिए युद्ध करने में की गई ऐसी हिंसा वस्तुतः हिंसा है ही नहीं, क्योंकि किसी भी प्रकार से मनुष्य, अथवा अधिक उचित रूप से आत्मा, मारी नहीं जा सकती; अतः न्याय के प्रशासन के लिए तथाकथित हिंसा की अनुमति है। शल्यक्रिया का प्रयोजन रोगी को मारना नहीं, अपितु उसे रोगमुक्त करना है। अतः श्रीकृष्ण के उपदेश पर अर्जुन द्वारा किया जाने वाला युद्ध पूर्ण ज्ञान के साथ है, अतः पापमय प्रतिक्रिया की कोई सम्भावना नहीं है।