हि

अध्याय 2 · 23 / 71

2.23

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥ २३ ॥

न—कभी नहीं; एनम्—इस आत्मा को; छिन्दन्ति—टुकड़ों में काट सकते हैं; शस्त्राणि—समस्त शस्त्र; न—कभी नहीं; एनम्—इस आत्मा को; दहति—जलाती है; पावकः—अग्नि; न—कभी नहीं; च—भी; एनम्—इस आत्मा को; क्लेदयन्ति—भिगोता है; आपः—जल; न—कभी नहीं; शोषयति—सुखाती है; मारुतः—वायु।

आत्मा को न तो किसी शस्त्र से खण्ड-खण्ड किया जा सकता है, न अग्नि से जलाया जा सकता है, न जल से भिगोया जा सकता है, और न वायु से सुखाया जा सकता है।

समस्त प्रकार के शस्त्र, तलवारें, ज्वालाएँ, वर्षा, बवण्डर आदि आत्मा को मारने में असमर्थ हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि अग्नि के आधुनिक शस्त्रों के अतिरिक्त, पृथ्वी, जल, वायु, आकाश आदि से बने अनेक प्रकार के शस्त्र थे। आधुनिक युग के परमाणु शस्त्र भी अग्नि-शस्त्रों में वर्गीकृत किए जाते हैं, किन्तु पूर्वकाल में विभिन्न प्रकार के भौतिक तत्त्वों से बने अन्य शस्त्र भी थे। अग्नि-अस्त्रों का प्रतिकार जल-अस्त्रों से किया जाता था, जो अब आधुनिक विज्ञान को अज्ञात हैं। न ही आधुनिक वैज्ञानिकों को बवण्डर-अस्त्रों का ज्ञान है। तथापि आत्मा को न तो खण्ड-खण्ड किया जा सकता है, और न ही किसी भी संख्या के शस्त्रों से, चाहे वे कितने भी वैज्ञानिक उपकरण हों, नष्ट किया जा सकता है।

न ही कभी यह सम्भव था कि व्यक्तिगत आत्माओं को मूल आत्मा से काटा जा सके। तथापि मायावादी यह वर्णन नहीं कर पाते कि व्यक्तिगत आत्मा अज्ञान से कैसे उद्भूत हुई और परिणामस्वरूप मायाशक्ति से कैसे आवृत हो गई। चूँकि वे नित्य रूप से अणु-रूप व्यक्तिगत आत्माएँ (सनातन) हैं, अतः वे मायाशक्ति से आवृत होने की प्रवृत्ति रखती हैं, और इस प्रकार वे परमेश्वर के संग से पृथक् हो जाती हैं, ठीक जैसे अग्नि के स्फुलिंग, यद्यपि अग्नि के साथ गुण में एक हैं, अग्नि से बाहर आने पर बुझ जाने की प्रवृत्ति रखते हैं। वराह पुराण में जीवों को परम के पृथक् अंशों के रूप में वर्णित किया गया है। भगवद्गीता के अनुसार भी वे नित्य रूप से ऐसे ही हैं। अतः, भ्रम से मुक्त होने के पश्चात् भी, जीव एक पृथक् अस्तित्व बना रहता है, जैसा कि अर्जुन को दिए गए भगवान् के उपदेशों से स्पष्ट है। अर्जुन श्रीकृष्ण से प्राप्त ज्ञान के द्वारा मुक्त हुए, किन्तु वे कभी श्रीकृष्ण के साथ एक नहीं हुए।