अध्याय 2 · 24 / 71
2.24
अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च ।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥ २४ ॥
अच्छेद्यः—अखण्ड्य; अयम्—यह आत्मा; अदाह्यः—जलाई नहीं जा सकती; अयम्—यह आत्मा; अक्लेद्यः—अघुलनशील; अशोष्यः—सुखाई नहीं जा सकती; एव—निश्चय ही; च—और; नित्यः—शाश्वत; सर्व-गतः—सर्वव्यापी; स्थाणुः—अपरिवर्तनशील; अचलः—अचल; अयम्—यह आत्मा; सनातनः—नित्य रूप से वही।
यह व्यक्तिगत आत्मा अखण्ड्य और अघुलनशील है, और इसे न जलाया जा सकता है और न सुखाया जा सकता है। वह शाश्वत, सर्वव्यापी, अपरिवर्तनशील, अचल और नित्य रूप से वही है।
अणु-रूप आत्मा के ये समस्त लक्षण निश्चय ही सिद्ध करते हैं कि व्यक्तिगत आत्मा नित्य रूप से आध्यात्मिक पूर्ण का अणु-रूप कण है, और वह बिना परिवर्तन के नित्य रूप से वही अणु बनी रहती है। अद्वैतवाद का सिद्धान्त इस स्थिति में लागू करना अत्यन्त कठिन है, क्योंकि व्यक्तिगत आत्मा से कभी यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वह समरूप होकर एक हो जाए। भौतिक संदूषण से मुक्ति के पश्चात् अणु-रूप आत्मा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की देदीप्यमान किरणों में एक आध्यात्मिक स्फुलिंग के रूप में रहना पसन्द कर सकती है, किन्तु बुद्धिमान् आत्माएँ भगवान् के संग के लिए आध्यात्मिक लोकों में प्रवेश करती हैं।
सर्व-गतः (सर्वव्यापी) शब्द सार्थक है, क्योंकि इसमें कोई सन्देह नहीं कि जीव ईश्वर की समस्त सृष्टि में सर्वत्र हैं। वे स्थल पर, जल में, वायु में, पृथ्वी के भीतर और अग्नि के भीतर भी निवास करते हैं। यह मान्यता कि वे अग्नि में नष्ट हो जाते हैं, स्वीकार्य नहीं है, क्योंकि यहाँ स्पष्ट रूप से कहा गया है कि आत्मा अग्नि से जलाई नहीं जा सकती। अतः इसमें कोई सन्देह नहीं कि सूर्यलोक में भी, वहाँ रहने के लिए उपयुक्त शरीरों के साथ, जीव हैं। यदि सूर्यमण्डल निर्जन है, तो सर्व-गतः—सर्वत्र निवास करने वाले—शब्द निरर्थक हो जाता है।