हि

अध्याय 2 · 25 / 71

2.25

अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते ।
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ॥ २५ ॥

अव्यक्तः—अदृश्य; अयम्—यह आत्मा; अचिन्त्यः—अचिन्त्य; अयम्—यह आत्मा; अविकार्यः—अपरिवर्तनशील; अयम्—यह आत्मा; उच्यते—कही जाती है; तस्मात्—अतः; एवम्—इस प्रकार; विदित्वा—भली-भाँति जानकर; एनम्—इस आत्मा को; न—मत; अनुशोचितुम्—शोक करना; अर्हसि—तुम्हें योग्य।

कहा जाता है कि आत्मा अदृश्य, अचिन्त्य, अविकारी और अपरिवर्तनशील है। यह जानकर तुम्हें शरीर के लिए शोक नहीं करना चाहिए।

जैसा पहले वर्णित किया गया, हमारी भौतिक गणना के लिए आत्मा का परिमाण इतना सूक्ष्म है कि उसे शक्तिशाली से शक्तिशाली सूक्ष्मदर्शी से भी नहीं देखा जा सकता; अतः वह अदृश्य है। जहाँ तक आत्मा के अस्तित्व का प्रश्न है, श्रुति अथवा वैदिक प्रज्ञा के प्रमाण से परे कोई भी उसका अस्तित्व प्रायोगिक रूप से सिद्ध नहीं कर सकता। हमें इस सत्य को स्वीकार करना ही होगा, क्योंकि आत्मा के अस्तित्व को समझने का अन्य कोई स्रोत नहीं है, यद्यपि यह अनुभूति से एक तथ्य है। ऐसी अनेक वस्तुएँ हैं जिन्हें हमें केवल श्रेष्ठ अधिकार के आधार पर स्वीकार करना पड़ता है। माता के अधिकार के आधार पर कोई भी अपने पिता के अस्तित्व का निषेध नहीं कर सकता। माता के अधिकार के अतिरिक्त पिता की पहचान समझने का अन्य कोई स्रोत नहीं है। इसी प्रकार वेदों के अध्ययन के अतिरिक्त आत्मा को समझने का अन्य कोई स्रोत नहीं है। दूसरे शब्दों में, आत्मा मानवीय प्रायोगिक ज्ञान से अचिन्त्य है। आत्मा चेतना है और चेतन है—यह भी वेदों का कथन है, और हमें इसे स्वीकार करना होगा। शारीरिक परिवर्तनों के विपरीत, आत्मा में कोई परिवर्तन नहीं है। नित्य रूप से अपरिवर्तनशील होने के कारण, आत्मा अनन्त परमात्मा की तुलना में अणु-रूप बनी रहती है। परमात्मा अनन्त है, और अणु-रूप आत्मा अत्यन्त सूक्ष्म है। अतः अत्यन्त सूक्ष्म आत्मा, अपरिवर्तनशील होने के कारण, कभी अनन्त आत्मा, अथवा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के समान नहीं हो सकती। आत्मा की धारणा की स्थिरता की पुष्टि करने हेतु ही वेदों में इस संकल्पना को भिन्न-भिन्न प्रकार से दोहराया गया है। किसी वस्तु की पुनरावृत्ति इसलिए आवश्यक है, ताकि हम उस विषय को बिना त्रुटि के भली-भाँति समझ सकें।