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अध्याय 2 · 27 / 71

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जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च ।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ २७ ॥

जातस्य—जिसने जन्म लिया है उसकी; हि—निश्चय ही; ध्रुवः—निश्चित तथ्य; मृत्युः—मृत्यु; ध्रुवम्—यह भी निश्चित है; जन्म—जन्म; मृतस्य—मृत का; च—भी; तस्मात्—अतः; अपरिहार्ये—जो अपरिहार्य है उसके; अर्थे—विषय में; न—मत; त्वम्—तुम; शोचितुम्—शोक करने हेतु; अर्हसि—योग्य हो।

जिसने जन्म लिया है, उसकी मृत्यु निश्चित है; और जो मर चुका है, उसका जन्म निश्चित है। अतः अपने अपरिहार्य कर्तव्य के निर्वाह में तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।

मनुष्य को अपने जीवन के कर्मों के अनुसार जन्म लेना पड़ता है। और कर्मों के एक कालखण्ड को पूर्ण करके उसे अगले जन्म हेतु मरना पड़ता है। इस प्रकार जन्म-मृत्यु का यह चक्र, बिना मुक्ति के, एक के बाद एक घूमता रहता है। तथापि जन्म-मृत्यु का यह चक्र अनावश्यक हत्या, संहार तथा युद्ध का समर्थन नहीं करता। किन्तु साथ ही, विधि-व्यवस्था बनाए रखने हेतु हिंसा तथा युद्ध मानव-समाज में अनिवार्य तत्त्व हैं।

कुरुक्षेत्र का युद्ध, परमेश्वर की इच्छा होने के कारण, एक अनिवार्य घटना थी, और न्यायसंगत पक्ष की ओर से युद्ध करना क्षत्रिय का कर्तव्य है। जब वह अपने उचित कर्तव्य का निर्वाह कर रहा था, तब अपने सम्बन्धियों की मृत्यु से वह क्यों भयभीत अथवा शोकाकुल हो? वह न्याय के विधान को भंग करने और इस प्रकार उन पापकर्मों के फलों का भागी बनने योग्य नहीं था, जिनसे वह इतना भयभीत था। अपने उचित कर्तव्य के निर्वाह से विमुख होकर वह न तो अपने सम्बन्धियों की मृत्यु रोक पाता, और कर्म के मिथ्या मार्ग के चयन के कारण वह पतित भी हो जाता।