हि

अध्याय 2 · 28 / 71

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अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत ।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥ २८ ॥

अव्यक्तादीनि—आरम्भ में अव्यक्त; भूतानि—जो कुछ सृजित हुआ है; व्यक्त—व्यक्त; मध्यानि—मध्य में; भारत—हे भरतवंशी; अव्यक्त—अव्यक्त; निधनानि—जो कुछ विनष्ट हो जाता है; एव—यह सब ऐसा ही है; तत्र—अतः; का—क्या; परिदेवना—शोक।

समस्त सृजित प्राणी अपने आरम्भ में अव्यक्त रहते हैं, अपनी मध्यवर्ती अवस्था में व्यक्त होते हैं, और संहार होने पर पुनः अव्यक्त हो जाते हैं। तो फिर शोक की क्या आवश्यकता है?

यह स्वीकार करते हुए कि दार्शनिकों के दो वर्ग हैं — एक आत्मा के अस्तित्व में विश्वास करने वाला तथा दूसरा आत्मा के अस्तित्व में विश्वास न करने वाला — दोनों ही स्थितियों में शोक का कोई कारण नहीं है। आत्मा के अस्तित्व में विश्वास न करने वालों को वैदिक ज्ञान के अनुयायी नास्तिक कहते हैं। फिर भी यदि तर्क हेतु हम नास्तिक सिद्धान्त को स्वीकार भी कर लें, तब भी शोक का कोई कारण नहीं रहता। आत्मा के पृथक् अस्तित्व को छोड़कर, भौतिक तत्त्व सृष्टि से पूर्व अव्यक्त रहते हैं। अव्यक्तता की इसी सूक्ष्म अवस्था से व्यक्तता उत्पन्न होती है, जिस प्रकार आकाश से वायु जन्म लेती है; वायु से अग्नि उत्पन्न होती है; अग्नि से जल उत्पन्न होता है; और जल से पृथ्वी व्यक्त होती है। पृथ्वी से अनेक प्रकार के प्रकटीकरण होते हैं। उदाहरणार्थ, पृथ्वी से व्यक्त हुए एक विशाल गगनचुम्बी भवन को ही लें। जब उसे ध्वस्त किया जाता है, तब वह प्रकटीकरण पुनः अव्यक्त हो जाता है और अन्तिम अवस्था में परमाणुओं के रूप में रह जाता है। ऊर्जा-संरक्षण का नियम बना रहता है, किन्तु समय के साथ वस्तुएँ व्यक्त तथा अव्यक्त होती रहती हैं — यही अन्तर है। तो फिर व्यक्त अवस्था में हो अथवा अव्यक्त अवस्था में, शोक का क्या कारण है? किसी न किसी प्रकार, अव्यक्त अवस्था में भी वस्तुएँ नष्ट नहीं होतीं। आरम्भ में तथा अन्त में, दोनों ही में समस्त तत्त्व अव्यक्त रहते हैं, और केवल मध्य में वे व्यक्त होते हैं; और इससे कोई वास्तविक भौतिक अन्तर नहीं पड़ता।

और यदि हम भगवद्गीता में कथित वैदिक निष्कर्ष को स्वीकार करें (अन्तवन्त इमे देहाः) कि ये भौतिक शरीर समय आने पर नश्वर हैं (नित्यस्योक्ताः शरीरिणः) किन्तु आत्मा नित्य है, तब हमें सदा यह स्मरण रखना चाहिए कि शरीर वस्त्र के समान है; अतः वस्त्र के परिवर्तन पर शोक क्यों करें? नित्य आत्मा की तुलना में भौतिक शरीर का कोई तथ्यगत अस्तित्व नहीं है। यह स्वप्न के समान है। स्वप्न में हम आकाश में उड़ने का, अथवा राजा के रूप में रथ पर बैठने का विचार कर सकते हैं, किन्तु जब हम जागते हैं तब देखते हैं कि न तो हम आकाश में हैं और न रथ पर आसीन। वैदिक प्रज्ञा भौतिक शरीर की अनित्यता के आधार पर आत्म-साक्षात्कार को प्रोत्साहित करती है। अतः दोनों ही स्थितियों में, चाहे कोई आत्मा के अस्तित्व में विश्वास करे, अथवा आत्मा के अस्तित्व में विश्वास न करे, शरीर के नाश हेतु शोक का कोई कारण नहीं है।