अध्याय 2 · 29 / 71
2.29
आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन -
माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः ।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति
श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ॥ २९ ॥
आश्चर्यवत्—आश्चर्यजनक; पश्यति—देखता है; कश्चित्—कोई; एनम्—इस आत्मा को; आश्चर्यवत्—आश्चर्यजनक; वदति—कहता है; तथा—वहाँ; एव—निश्चय ही; च—भी; अन्यः—अन्य; आश्चर्यवत्—इसी प्रकार आश्चर्यजनक; च—भी; एनम्—इस आत्मा को; अन्यः—अन्य; शृणोति—सुनता है; श्रुत्वा—सुनकर भी; अपि—भी; एनम्—इस आत्मा को; वेद—जानते हैं; न—कभी नहीं; च—और; एव—निश्चय ही; कश्चित्—कोई।
कोई आत्मा को आश्चर्यजनक रूप में देखते हैं, कोई इसका वर्णन आश्चर्यजनक रूप में करते हैं, और कोई इसके विषय में आश्चर्यजनक रूप में सुनते हैं, जबकि अन्य लोग इसके विषय में सुनकर भी इसे तनिक भी नहीं समझ पाते।
चूँकि गीतोपनिषद् मुख्यतः उपनिषदों के सिद्धान्तों पर आधारित है, अतः इस अंश को कठोपनिषद् में भी पाना आश्चर्यजनक नहीं है।
śravaṇāyāpi bahubhir yo na labhyaḥ
śṛṇvanto ‘pi bahavo yaḥ na vidyuḥ
āścaryo vaktā kuśalo ‘sya labdhā
āścaryo jñātā kuśalānuśiṣṭaḥ.
यह तथ्य कि अणु-आत्मा एक विशालकाय पशु के शरीर में, एक विशाल वटवृक्ष के शरीर में, और उन सूक्ष्म जीवाणुओं में भी विद्यमान है, जिनके करोड़ों-अरबों केवल एक इंच स्थान को घेरते हैं — निश्चय ही अत्यन्त आश्चर्यजनक है। अल्प ज्ञान-निधि वाले तथा तपरहित मनुष्य आत्मा की उस वैयक्तिक अणु-स्फुलिंग के आश्चर्यों को नहीं समझ सकते, यद्यपि इसे ज्ञान के सर्वोच्च अधिकारी द्वारा समझाया गया है, जिन्होंने ब्रह्मांड के प्रथम जीव ब्रह्मा को भी शिक्षा प्रदान की। वस्तुओं की स्थूल भौतिक धारणा के कारण, इस युग के अधिकांश मनुष्य यह कल्पना नहीं कर सकते कि इतना छोटा कण किस प्रकार इतना महान् तथा इतना सूक्ष्म, दोनों हो सकता है। अतः मनुष्य आत्मा को स्वरूप द्वारा अथवा वर्णन द्वारा आश्चर्यजनक मानते हैं। भौतिक ऊर्जा से मोहित होकर, लोग इन्द्रियतृप्ति के विषयों में इतने तल्लीन रहते हैं कि उनके पास आत्म-बोध के प्रश्न को समझने का अत्यल्प समय रहता है, यद्यपि यह तथ्य है कि इस आत्म-बोध के बिना समस्त कर्म अस्तित्व-संघर्ष में अन्ततः पराजय में ही परिणत होते हैं। सम्भवतः मनुष्य को इसका तनिक भी भान नहीं कि उसे आत्मा का चिन्तन करना चाहिए, और साथ ही भौतिक दुःखों का समाधान भी करना चाहिए।
जो लोग आत्मा के विषय में सुनने के इच्छुक होते हैं, वे सत्संग में प्रवचन सुनते रहते हैं, किन्तु कभी-कभी अज्ञानवश वे परमात्मा तथा अणु-आत्मा को परिमाण के भेद बिना एक ही मानने की भ्रान्ति में पड़ जाते हैं। ऐसा मनुष्य पाना अत्यन्त कठिन है, जो आत्मा, परमात्मा, अणु-आत्मा, उनके अपने-अपने कार्यों, सम्बन्धों तथा अन्य समस्त गौण-प्रधान विवरणों को भली-भाँति समझता हो। और ऐसा मनुष्य पाना तो और भी कठिन है, जिसने आत्मा के ज्ञान से वस्तुतः पूर्ण लाभ उठाया हो, और जो आत्मा की स्थिति का विभिन्न पक्षों से वर्णन कर सके। किन्तु यदि किसी न किसी प्रकार कोई आत्मा के विषय को समझ ले, तब उसका जीवन सफल हो जाता है। तथापि आत्मा के विषय को समझने की सरलतम विधि यही है कि सर्वोच्च अधिकारी भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा कही गई भगवद्गीता के कथनों को, अन्य सिद्धान्तों से विचलित हुए बिना, स्वीकार कर लिया जाए। किन्तु इससे पूर्व कि कोई श्रीकृष्ण को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में स्वीकार कर सके, इस जीवन में अथवा पूर्व जन्मों में बहुत अधिक तपस्या तथा त्याग की भी आवश्यकता होती है। तथापि श्रीकृष्ण को इस रूप में शुद्ध भक्त की अहैतुकी कृपा से ही जाना जा सकता है, अन्य किसी प्रकार से नहीं।