अध्याय 2 · 30 / 71
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देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत ।
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ ३० ॥
देही—भौतिक शरीर का स्वामी; नित्यम्—नित्य रूप से; अवध्यः—मारा नहीं जा सकता; अयम्—यह आत्मा; देहे—शरीर में; सर्वस्य—प्रत्येक के; भारत—हे भरतवंशी; तस्मात्—अतः; सर्वाणि—समस्त; भूतानि—जीव (जो जन्म लेते हैं); न—कभी नहीं; त्वम्—तुम्हें; शोचितुम्—शोक करने हेतु; अर्हसि—योग्य हो।
हे भरतवंशी, जो शरीर में निवास करता है वह नित्य है और कभी मारा नहीं जा सकता। अतः तुम्हें किसी भी प्राणी हेतु शोक करने की आवश्यकता नहीं है।
अब भगवान् अविनाशी आत्मा पर उपदेश के इस प्रकरण का उपसंहार करते हैं। अमर आत्मा का विविध प्रकार से वर्णन करते हुए, भगवान् श्रीकृष्ण यह स्थापित करते हैं कि आत्मा अमर है और शरीर अनित्य है। अतः अर्जुन को क्षत्रिय के रूप में इस भय से अपने कर्तव्य का परित्याग नहीं करना चाहिए कि उसके पितामह तथा गुरु — भीष्म तथा द्रोण — युद्ध में मारे जाएँगे। श्री कृष्ण के अधिकार पर, मनुष्य को यह विश्वास करना चाहिए कि भौतिक शरीर से भिन्न एक आत्मा है, न कि यह कि आत्मा नामक कोई वस्तु ही नहीं है, अथवा यह कि रासायनिक पदार्थों की पारस्परिक क्रिया से उत्पन्न भौतिक परिपक्वता की किसी अवस्था पर जीवन के लक्षण विकसित होते हैं। यद्यपि आत्मा अमर है, तथापि हिंसा को प्रोत्साहित नहीं किया जाता, किन्तु युद्ध के समय, जब उसकी वास्तविक आवश्यकता हो, तब उसे निरुत्साहित भी नहीं किया जाता। उस आवश्यकता को भगवान् के अनुमोदन की दृष्टि से न्यायसंगत होना चाहिए, स्वेच्छाचार से नहीं।