अध्याय 2 · 31 / 71
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स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि ।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥ ३१ ॥
स्वधर्मम्—अपने धार्मिक नियमों को; अपि—भी; च—वस्तुतः; अवेक्ष्य—विचार करते हुए; न—कभी नहीं; विकम्पितुम्—विचलित होने हेतु; अर्हसि—तुम योग्य हो; धर्म्यात्—धार्मिक नियमों से; हि—वस्तुतः; युद्धात्—युद्ध की अपेक्षा; श्रेयः—श्रेष्ठ कार्य; अन्यत्—कुछ और; क्षत्रियस्य—क्षत्रिय का; न—नहीं; विद्यते—होता है।
क्षत्रिय के रूप में अपने विशिष्ट कर्तव्य पर विचार करते हुए तुम्हें जान लेना चाहिए कि धार्मिक नियमों के आधार पर युद्ध करने से श्रेष्ठ कोई कार्य तुम्हारे लिए नहीं है; अतः हिचकिचाने की कोई आवश्यकता नहीं है।
सामाजिक प्रशासन की चार व्यवस्थाओं में से, सुप्रशासन के निमित्त दूसरी व्यवस्था क्षत्रिय कहलाती है। क्षत् का अर्थ है आघात। जो आघात से रक्षा प्रदान करता है, वह क्षत्रिय कहलाता है (त्रायते—रक्षा प्रदान करना)। क्षत्रियों को वन में वध करने का प्रशिक्षण दिया जाता है। क्षत्रिय वन में जाकर किसी व्याघ्र को आमने-सामने ललकारता और अपनी तलवार से उससे युद्ध करता था। जब व्याघ्र मारा जाता, तब उसका राजकीय रीति से अन्त्येष्टि-संस्कार किया जाता था। यह प्रणाली आज तक भी जयपुर राज्य के क्षत्रिय राजाओं द्वारा अनुसरित होती है। क्षत्रियों को ललकारने तथा वध करने का विशेष प्रशिक्षण इसलिए दिया जाता है, क्योंकि धार्मिक हिंसा कभी-कभी एक आवश्यक तत्त्व होती है। अतः क्षत्रियों का कभी यह अभिप्राय नहीं होता कि वे सीधे संन्यास अथवा त्याग की व्यवस्था स्वीकार करें। राजनीति में अहिंसा एक कूटनीति हो सकती है, किन्तु यह कभी कोई तत्त्व अथवा सिद्धान्त नहीं है। धार्मिक विधि-ग्रन्थों में कहा गया है:
āhaveṣu mitho ‘nyonyaṁ jighāṁsanto mahīkṣitaḥ
yuddhamānāḥ paraṁ śaktyā svargaṁ yānty aparāṅmukhāḥ
yajñeṣu paśavo brahman hanyante satataṁ dvijaiḥ
saṁskṛtāḥ kila mantraiś ca te ‘pi svargam avāpnuvan.
“युद्धभूमि में, जब कोई राजा अथवा क्षत्रिय अपने से ईर्ष्या करने वाले किसी अन्य राजा से युद्ध करता है, तब वह मृत्यु के पश्चात् स्वर्गलोक प्राप्त करने का अधिकारी होता है, जैसे ब्राह्मण भी यज्ञाग्नि में पशुओं का बलिदान करके स्वर्गलोक प्राप्त करते हैं।” अतः धार्मिक सिद्धान्त पर युद्ध में वध करना तथा यज्ञाग्नि में पशुओं का वध करना तनिक भी हिंसा के कृत्य नहीं माने जाते, क्योंकि इनमें निहित धार्मिक सिद्धान्तों से प्रत्येक को लाभ होता है। बलि किया गया पशु एक रूप से दूसरे रूप में क्रमिक विकासात्मक प्रक्रिया से गुज़रे बिना तुरन्त मानव-जीवन प्राप्त करता है, और युद्धभूमि में मारे गए क्षत्रिय भी उसी प्रकार स्वर्गलोक प्राप्त करते हैं, जैसे यज्ञ अर्पित करके उसे प्राप्त करने वाले ब्राह्मण।
स्वधर्म, अर्थात् विशिष्ट कर्तव्य, दो प्रकार के होते हैं। जब तक मनुष्य मुक्त नहीं होता, तब तक उसे मुक्ति प्राप्त करने हेतु उस विशिष्ट शरीर के कर्तव्यों का धार्मिक नियमों के अनुसार पालन करना पड़ता है। जब मनुष्य मुक्त हो जाता है, तब उसका स्वधर्म — विशिष्ट कर्तव्य — आध्यात्मिक हो जाता है और भौतिक देहात्म-बुद्धि में नहीं रहता। जीवन की देहात्म-बुद्धि में ब्राह्मणों तथा क्षत्रियों के क्रमशः विशिष्ट कर्तव्य होते हैं, और ऐसे कर्तव्य अपरिहार्य हैं। स्वधर्म भगवान् द्वारा निर्धारित है, और इसे चौथे अध्याय में स्पष्ट किया जाएगा। दैहिक तल पर स्वधर्म वर्णाश्रम-धर्म कहलाता है, अर्थात् आध्यात्मिक बोध हेतु मनुष्य की सोपान-शिला। मानव-सभ्यता वर्णाश्रम-धर्म की अवस्था से, अर्थात् प्राप्त शरीर के विशिष्ट प्रकृति-गुणों के अनुरूप विशिष्ट कर्तव्यों से, आरम्भ होती है। कर्म के किसी भी क्षेत्र में वर्णाश्रम-धर्म के अनुसार अपने विशिष्ट कर्तव्य का निर्वाह मनुष्य को जीवन की उच्चतर स्थिति तक उन्नत करने में सहायक होता है।