हि

अध्याय 2 · 33 / 71

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अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सङ्ग्रामं न करिष्यसि ।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥ ३३ ॥

अथ—अतः; चेत्—यदि; त्वम्—तुम; इमम्—इस; धर्म्यम्—धार्मिक कर्तव्य; संग्रामम्—युद्ध; न—मत; करिष्यसि—करोगे; ततः—तब; स्वधर्मम्—अपना धार्मिक कर्तव्य; कीर्तिम्—यश; च—भी; हित्वा—खोकर; पापम्—पापमय फल; अवाप्स्यसि—प्राप्त करोगे।

किन्तु यदि तुम इस धार्मिक युद्ध को नहीं करोगे, तब तुम अपने कर्तव्यों की उपेक्षा के कारण निश्चय ही पाप के भागी बनोगे और इस प्रकार योद्धा के रूप में अपना यश खो दोगे।

अर्जुन एक प्रसिद्ध योद्धा था, और उसने अनेक महान् देवताओं से, यहाँ तक कि भगवान् शिव से भी, युद्ध करके यश अर्जित किया था। व्याध के वेश में भगवान् शिव से युद्ध करके तथा उन्हें परास्त करके, अर्जुन ने उन्हें प्रसन्न किया और पुरस्कार स्वरूप पाशुपत-अस्त्र नामक शस्त्र प्राप्त किया। सभी जानते थे कि वह एक महान् योद्धा था। द्रोणाचार्य ने भी उसे आशीर्वाद दिया और वह विशेष शस्त्र प्रदान किया, जिससे वह अपने गुरु को भी मार सकता था। अतः उसे अपने दत्तक पिता, स्वर्ग के राजा इन्द्र सहित, अनेक अधिकारियों से इतने सारे सैन्य प्रमाणपत्र प्राप्त थे। किन्तु यदि वह युद्ध का परित्याग कर देता, तो वह न केवल क्षत्रिय के रूप में अपने विशिष्ट कर्तव्य की उपेक्षा करता, अपितु अपना समस्त यश तथा सुनाम भी खो देता और इस प्रकार नरक की ओर अपना राजमार्ग प्रशस्त कर लेता। दूसरे शब्दों में, वह युद्ध करने से नहीं, अपितु युद्ध से विमुख होने से नरक जाता।