हि

अध्याय 2 · 34 / 71

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अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् ।
सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ॥ ३४ ॥

अकीर्तिम्—अपयश; च—भी; अपि—इसके अतिरिक्त; भूतानि—समस्त लोग; कथयिष्यन्ति—कहेंगे; ते—तुम्हारे; अव्ययाम्—सदा-सर्वदा; सम्भावितस्य—सम्मानित व्यक्ति के लिए; च—भी; अकीर्तिः—अपयश; मरणात्—मृत्यु से; अतिरिच्यते—बढ़कर हो जाता है।

लोग सदा तुम्हारे अपयश की चर्चा करेंगे, और जो सम्मानित रहा हो, उसके लिए अपयश मृत्यु से भी बढ़कर है।

अर्जुन के सखा तथा दार्शनिक, दोनों रूपों में, भगवान् श्रीकृष्ण अब अर्जुन के युद्ध-निषेध के विषय में अपना अन्तिम निर्णय देते हैं। भगवान् कहते हैं, “हे अर्जुन, यदि तुम युद्धभूमि छोड़ोगे, तो लोग तुम्हें तुम्हारे वास्तविक पलायन से पूर्व ही कायर कहेंगे। और यदि तुम यह सोचते हो कि लोग तुम्हें भले ही बुरे नाम दें, किन्तु तुम युद्धभूमि से भागकर अपने प्राण बचा लोगे, तो मेरा परामर्श यह है कि तुम्हारे लिए युद्ध में मरना ही श्रेयस्कर है। तुम जैसे सम्मानित व्यक्ति के लिए अपयश मृत्यु से भी बढ़कर है। अतः तुम्हें अपने प्राणों के भय से नहीं भागना चाहिए; युद्ध में मरना ही श्रेष्ठ है। इससे तुम मेरी मित्रता के दुरुपयोग के अपयश से तथा समाज में अपनी प्रतिष्ठा खोने से बच जाओगे।”

अतः भगवान् का अन्तिम निर्णय यही था कि अर्जुन युद्ध में मरे और विमुख न हो।