अध्याय 2 · 35 / 71
2.35
भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः ।
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् ॥ ३५ ॥
भयात्—भय के कारण; रणात्—युद्धभूमि से; उपरतम्—विरत; मंस्यन्ते—मानेंगे; त्वाम्—तुम्हें; महा-रथाः—महान् सेनापति; येषाम्—जिनके; च—भी; त्वम्—तुम; बहु-मतः—अत्यन्त सम्मानित; भूत्वा—हो चुके होकर; यास्यसि—जाओगे; लाघवम्—मूल्य में घटे हुए।
जिन महान् सेनापतियों ने तुम्हारे नाम तथा यश का अत्यधिक सम्मान किया है, वे यही सोचेंगे कि तुमने केवल भय के कारण युद्धभूमि त्याग दी, और इस प्रकार वे तुम्हें कायर मानेंगे।
भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को अपना निर्णय सुनाते रहे: “यह मत समझो कि दुर्योधन, कर्ण तथा अन्य समकालीन महान् सेनापति यह सोचेंगे कि तुमने अपने भाइयों तथा पितामह के प्रति करुणावश युद्धभूमि छोड़ी। वे यही सोचेंगे कि तुमने अपने प्राणों के भय से इसे छोड़ा। और इस प्रकार तुम्हारे व्यक्तित्व के प्रति उनका उच्च सम्मान नरक को चला जाएगा।”