अध्याय 2 · 36 / 71
2.36
अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः ।
निन्दन्तस्तव सामर्थ्य ततो दुःखतरं नु किम् ॥ ३६ ॥
अवाच्य—कटु; वादान्—गढ़े हुए वचन; च—भी; बहून्—अनेक; वदिष्यन्ति—कहेंगे; तव—तुम्हारे; अहिताः—शत्रु; निन्दन्तः—निन्दा करते हुए; तव—तुम्हारी; सामर्थ्यम्—सामर्थ्य; ततः—उसके पश्चात्; दुःखतरम्—अधिक पीड़ादायक; नु—निश्चय ही; किम्—क्या है।
तुम्हारे शत्रु अनेक कटु वचनों में तुम्हारा वर्णन करेंगे और तुम्हारी सामर्थ्य का उपहास करेंगे। तुम्हारे लिए इससे अधिक पीड़ादायक और क्या हो सकता है?
भगवान् श्रीकृष्ण आरम्भ में अर्जुन की करुणा हेतु अनुचित याचना पर चकित हुए थे, और उन्होंने उसकी करुणा को अनार्यों के योग्य बताया था। अब इतने सारे वचनों में उन्होंने अर्जुन की तथाकथित करुणा के विरुद्ध अपने कथनों को सिद्ध कर दिया है।