अध्याय 2 · 37 / 71
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हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्ग जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् ।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ॥ ३७ ॥
हतः—मारा जाकर; वा—अथवा; प्राप्स्यसि—तुम प्राप्त करोगे; स्वर्गम्—स्वर्गलोक; जित्वा—जीतकर; वा—अथवा; भोक्ष्यसे—तुम भोग करोगे; महीम्—संसार का; तस्मात्—अतः; उत्तिष्ठ—उठ खड़े हो; कौन्तेय—हे कुन्तीपुत्र; युद्धाय—युद्ध हेतु; कृत—दृढ़; निश्चयः—संकल्प।
हे कुन्तीपुत्र, या तो तुम युद्धभूमि में मारे जाकर स्वर्गलोक प्राप्त करोगे, या तुम विजयी होकर पृथ्वी के राज्य का भोग करोगे। अतः उठ खड़े हो और दृढ़ संकल्प के साथ युद्ध करो।
यद्यपि अर्जुन के पक्ष की विजय की कोई निश्चितता नहीं थी, तथापि उसे युद्ध करना ही था; क्योंकि वहाँ मारे जाने पर भी, वह स्वर्गलोक तक उठाया जा सकता था।