अध्याय 2 · 39 / 71
2.39
एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु ।
बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ॥ ३९ ॥
एषा—यह समस्त; ते—तुम्हें; अभिहिता—वर्णित; सांख्ये—विश्लेषणात्मक अध्ययन द्वारा; बुद्धिः—बुद्धि; योगे—फलासक्ति-रहित कर्म में; तु—किन्तु; इमाम्—इसे; शृणु—सुनो; बुद्ध्या—बुद्धि से; युक्तः—समायोजित; यया—जिससे; पार्थ—हे पृथापुत्र; कर्म-बन्धम्—प्रतिक्रिया के बन्धन से; प्रहास्यसि—तुम मुक्त हो सकते हो।
अब तक मैंने तुम्हें सांख्य-दर्शन का विश्लेषणात्मक ज्ञान बतलाया। अब उस योग का ज्ञान सुनो, जिसके द्वारा मनुष्य फलासक्ति-रहित कर्म करता है। हे पृथापुत्र, जब तुम ऐसी बुद्धि से कर्म करते हो, तब तुम कर्म के बन्धन से अपने आपको मुक्त कर सकते हो।
निरुक्ति, अर्थात् वैदिक शब्दकोश के अनुसार, सांख्य का अर्थ है वह जो परिघटनाओं का विस्तार से वर्णन करता है, और सांख्य उस दर्शन को निर्दिष्ट करता है, जो आत्मा के वास्तविक स्वरूप का वर्णन करता है। और योग में इन्द्रियों का संयमन निहित है। अर्जुन का युद्ध न करने का प्रस्ताव इन्द्रियतृप्ति पर आधारित था। अपने प्रमुख कर्तव्य को भुलाकर, वह युद्ध से विरत होना चाहता था, क्योंकि उसने सोचा कि अपने सम्बन्धियों तथा बन्धु-बान्धवों का वध न करके वह धृतराष्ट्र के पुत्रों, अपने चचेरे भाइयों तथा भाइयों को जीतकर राज्य का भोग करने की अपेक्षा अधिक सुखी रहेगा। दोनों ही प्रकार से, मूल सिद्धान्त इन्द्रियतृप्ति ही था। उन्हें जीतकर प्राप्त सुख तथा बन्धु-बान्धवों को जीवित देखकर प्राप्त सुख, दोनों ही वैयक्तिक इन्द्रियतृप्ति के आधार पर हैं, क्योंकि इसमें प्रज्ञा तथा कर्तव्य का बलिदान निहित है। अतः श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझाना चाहते थे कि अपने पितामह के शरीर का वध करके वह आत्मा का वध नहीं करेगा, और उन्होंने समझाया कि समस्त वैयक्तिक व्यक्ति, स्वयं भगवान् सहित, नित्य वैयक्तिक सत्ताएँ हैं; वे भूत में वैयक्तिक थे, वे वर्तमान में वैयक्तिक हैं, और वे भविष्य में भी वैयक्तिक बने रहेंगे, क्योंकि हम सब नित्य रूप से वैयक्तिक आत्माएँ हैं, और हम केवल विभिन्न प्रकारों से अपना दैहिक वस्त्र बदलते हैं। किन्तु वस्तुतः हम भौतिक वस्त्र के बन्धन से मुक्ति के पश्चात् भी अपनी वैयक्तिकता बनाए रखते हैं। आत्मा तथा शरीर का विश्लेषणात्मक अध्ययन भगवान् श्रीकृष्ण ने अत्यन्त सजीव रूप से समझाया है। और विभिन्न दृष्टिकोणों से आत्मा तथा शरीर के इस वर्णनात्मक ज्ञान को यहाँ निरुक्ति शब्दकोश के अनुसार सांख्य कहा गया है। इस सांख्य का नास्तिक कपिल के सांख्य-दर्शन से कोई सम्बन्ध नहीं है। छली कपिल के सांख्य से बहुत पूर्व, सांख्य-दर्शन का प्रतिपादन सच्चे भगवान् कपिल ने, जो भगवान् श्रीकृष्ण के अवतार हैं, श्रीमद्भागवत में किया था, जिन्होंने इसे अपनी माता देवहूति को समझाया। उनके द्वारा यह स्पष्ट रूप से समझाया गया है कि पुरुष, अर्थात् परमेश्वर, सक्रिय हैं और वे प्रकृति पर दृष्टिपात करके सृष्टि करते हैं। यह वेदों में तथा गीता में स्वीकृत है। वेदों का वर्णन यह संकेत करता है कि भगवान् ने प्रकृति, अर्थात् नैसर्गिक प्रकृति पर दृष्टिपात किया और उसे अणु वैयक्तिक आत्माओं से गर्भित किया। ये समस्त वैयक्तिक आत्माएँ इन्द्रियतृप्ति हेतु भौतिक जगत् में कर्म कर रही हैं, और भौतिक ऊर्जा के वशीभूत होकर वे अपने आपको भोक्ता मान रही हैं। यह मनोवृत्ति मुक्ति के अन्तिम बिन्दु तक खिंची चली जाती है, जब जीव भगवान् के साथ एक होना चाहता है। यह माया, अर्थात् इन्द्रिय-भोग के भ्रम का अन्तिम जाल है, और अनेकानेक जन्मों की ऐसी इन्द्रिय-भोग की क्रियाओं के पश्चात् ही कोई महान् आत्मा वासुदेव, भगवान् श्रीकृष्ण की शरण ग्रहण करती है, और इस प्रकार परम सत्य की खोज को पूर्ण करती है।
अर्जुन ने अपने आपको श्रीकृष्ण के प्रति समर्पित करके उन्हें पहले ही अपना आध्यात्मिक गुरु स्वीकार कर लिया है: शिष्यस्ते ऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्। फलस्वरूप, श्रीकृष्ण अब उसे बुद्धि-योग, अथवा कर्म-योग की कार्य-प्रणाली के विषय में बताएँगे, अथवा दूसरे शब्दों में, केवल भगवान् की इन्द्रियतृप्ति हेतु भक्ति के अभ्यास के विषय में। इस बुद्धि-योग को दसवें अध्याय के दसवें श्लोक में स्पष्ट रूप से भगवान् के साथ प्रत्यक्ष सम्पर्क के रूप में समझाया गया है, जो प्रत्येक के हृदय में परमात्मा रूप में विराजमान हैं। किन्तु ऐसा सम्पर्क भक्ति के बिना नहीं होता। अतः जो मनुष्य भगवान् की भक्तिमयी अथवा दिव्य प्रेममयी सेवा में स्थित है, अथवा दूसरे शब्दों में, कृष्णभावनामृत में, वह भगवान् की विशेष कृपा से बुद्धि-योग की इस अवस्था को प्राप्त करता है। अतः भगवान् कहते हैं कि केवल उन्हीं को, जो दिव्य प्रेमवश सदा भक्ति में संलग्न रहते हैं, वे प्रेममयी भक्ति का शुद्ध ज्ञान प्रदान करते हैं। इस प्रकार भक्त उन्हें ईश्वर के सदा आनन्दमय धाम में सरलता से प्राप्त कर सकता है।
अतः इस श्लोक में वर्णित बुद्धि-योग भगवान् की भक्ति है, और यहाँ वर्णित सांख्य शब्द का छली कपिल द्वारा प्रतिपादित नास्तिक सांख्य-योग से कोई सम्बन्ध नहीं है। अतः किसी को यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि यहाँ वर्णित सांख्य-योग का नास्तिक सांख्य से कोई सम्बन्ध है। न तो उस दर्शन का उस समय कोई प्रभाव था; और न ही भगवान् श्रीकृष्ण ऐसी ईश्वर-विहीन दार्शनिक कल्पनाओं का उल्लेख करने की चिन्ता करते। वास्तविक सांख्य-दर्शन का वर्णन भगवान् कपिल ने श्रीमद्भागवत में किया है, किन्तु उस सांख्य का भी वर्तमान विषयों से कोई सम्बन्ध नहीं है। यहाँ, सांख्य का अर्थ है शरीर तथा आत्मा का विश्लेषणात्मक वर्णन। भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बुद्धि-योग, अर्थात् भक्ति-योग के बिन्दु तक लाने हेतु ही आत्मा का विश्लेषणात्मक वर्णन किया। अतः भगवान् श्रीकृष्ण का सांख्य तथा भगवान् कपिल का सांख्य, जैसा कि भागवत में वर्णित है, एक ही हैं। वे सब भक्ति-योग हैं। अतः उन्होंने कहा कि केवल अल्पबुद्धि वाले मनुष्य ही सांख्य-योग तथा भक्ति-योग में भेद करते हैं।
निस्सन्देह, नास्तिक सांख्य-योग का भक्ति-योग से कोई सम्बन्ध नहीं है, फिर भी अल्पबुद्धि लोग यह दावा करते हैं कि भगवद्गीता में उसी नास्तिक सांख्य-योग का निर्देश है।
अतः मनुष्य को यह समझना चाहिए कि बुद्धि-योग का अर्थ है कृष्णभावनामृत में, भक्ति के पूर्ण आनन्द तथा ज्ञान में, कर्म करना। जो केवल भगवान् की सन्तुष्टि हेतु कर्म करता है, चाहे वह कर्म कितना भी कठिन क्यों न हो, वह बुद्धि-योग के सिद्धान्तों के अधीन कर्म कर रहा है और अपने आपको सदा दिव्य आनन्द में पाता है। ऐसी दिव्य प्रवृत्ति से मनुष्य भगवान् की कृपा से स्वतः ही समस्त दिव्य गुण प्राप्त कर लेता है, और इस प्रकार उसकी मुक्ति अपने आप में पूर्ण हो जाती है, बिना ज्ञान अर्जित करने के बाह्य प्रयत्न किए। कृष्णभावनामृत में किए गए कर्म तथा सकाम फलों हेतु किए गए कर्म में बहुत अन्तर है, विशेषतः परिवार अथवा भौतिक सुख की दृष्टि से फल प्राप्त करने हेतु इन्द्रियतृप्ति के विषय में। अतः बुद्धि-योग उस कर्म का दिव्य गुण है, जिसे हम सम्पन्न करते हैं।