अध्याय 2 · 40 / 71
2.40
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥ ४० ॥
न—नहीं है; इह—इस जगत् में; अभिक्रम—प्रयत्न; नाशः—हानि; अस्ति—है; प्रत्यवायः—ह्रास; न—कभी नहीं; विद्यते—है; स्वल्पम्—थोड़ी; अपि—यद्यपि; अस्य—इस; धर्मस्य—इस वृत्ति का; त्रायते—मुक्त करती है; महतः—अत्यन्त महान्; भयात्—भय से।
इस प्रयत्न में न तो हानि है और न ह्रास, और इस मार्ग पर थोड़ी-सी भी प्रगति मनुष्य को सबसे भयंकर प्रकार के भय से रक्षा कर सकती है।
कृष्णभावनामृत में प्रवृत्ति, अर्थात् इन्द्रियतृप्ति की अपेक्षा बिना श्रीकृष्ण के हित हेतु कर्म करना, कर्म का सर्वोच्च दिव्य गुण है। ऐसी प्रवृत्ति का तनिक-सा आरम्भ भी कोई बाधा नहीं पाता, और न ही वह तनिक-सा आरम्भ किसी अवस्था में नष्ट हो सकता है। भौतिक तल पर आरम्भ किए गए किसी भी कर्म को पूर्ण करना पड़ता है, अन्यथा समस्त प्रयास विफल हो जाता है। किन्तु कृष्णभावनामृत में आरम्भ किए गए किसी भी कर्म का स्थायी प्रभाव होता है, यद्यपि वह पूर्ण न हुआ हो। अतः ऐसे कर्म का कर्ता हानि में नहीं रहता, भले ही कृष्णभावनामृत में उसका कर्म अपूर्ण रह जाए। कृष्णभावनामृत में किया गया एक प्रतिशत कर्म स्थायी फल देता है, जिससे अगला आरम्भ दो प्रतिशत के बिन्दु से होता है; जबकि भौतिक कर्म में, शत-प्रतिशत सफलता के बिना कोई लाभ नहीं होता। अजामिल ने अपने कर्तव्य को कृष्णभावनामृत के कुछ प्रतिशत में सम्पन्न किया, किन्तु भगवान् की कृपा से अन्त में उसने जिस फल का भोग किया, वह शत-प्रतिशत था। इस सम्बन्ध में श्रीमद्भागवत में एक सुन्दर श्लोक है:
tyaktvā sva-dharmaṁ caraṇāmbujaṁ harer
bhajan na pakko ‘tha patet tato yadi
yatra kva vābhadram abhūd amuṣya kiṁ
ko vārtha āpto ‘bhajatāṁ sva-dharmataḥ
“यदि कोई आत्म-तृप्ति के कार्यों का परित्याग करके कृष्णभावनामृत में कर्म करता है और तत्पश्चात् अपने कर्म को पूर्ण न कर पाने के कारण पतित हो जाता है, तो उसकी कौन-सी हानि है? और यदि कोई अपने भौतिक कर्मों को भली-भाँति सम्पन्न कर ले, तो उसे क्या लाभ हो सकता है?” (भा. 1.5.17) अथवा, जैसा कि ईसाई कहते हैं, “यदि मनुष्य समस्त संसार को जीत ले फिर भी अपनी नित्य आत्मा की हानि सहे, तो उसे क्या लाभ?”
भौतिक कर्म तथा उनके फल शरीर के साथ ही समाप्त हो जाते हैं। किन्तु कृष्णभावनामृत में किया गया कर्म व्यक्ति को शरीर के नाश के पश्चात् भी पुनः कृष्णभावनामृत तक ले जाता है। कम से कम वह अगले जीवन में पुनः मनुष्य रूप में, या तो किसी महान् सुसंस्कृत ब्राह्मण के परिवार में अथवा किसी धनी कुलीन परिवार में जन्म लेने का अवसर निश्चय ही प्राप्त करता है, जो उसे उन्नति हेतु आगे एक और अवसर देगा। यही कृष्णभावनामृत में किए गए कर्म का अद्वितीय गुण है।