हि

अध्याय 2 · 5 / 71

2.5

गुरूनहत्वा हि महानुभावान्
श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके ।
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव
भुज्जीय भोगान्रुधिरप्रदिग्धान् ॥ ५ ॥

गुरून्—गुरुजनों को; अहत्वा—मारे बिना; हि—निश्चय ही; महा-अनुभावान्—महान् आत्माओं को; श्रेयः—यह श्रेयस्कर है; भोक्तुम्—जीवन का भोग करना; भैक्ष्यम्—भिक्षा माँगकर; अपि—भी; इह—इस जीवन में; लोके—इस संसार में; हत्वा—मारकर; अर्थ—लाभ; कामान्—इच्छा करते हुए; तु—किन्तु; गुरून्—गुरुजन; इह—इस संसार में; एव—निश्चय ही; भुञ्जीय—भोगना पड़ता है; भोगान्—भोग्य वस्तुएँ; रुधिर—रक्त; प्रदिग्धान्—से सने हुए।

इस संसार में अपने गुरुजन उन महान् आत्माओं के प्राणों की कीमत पर जीने की अपेक्षा भिक्षा माँगकर जीना श्रेयस्कर है। यद्यपि वे लोभी हैं, तथापि वे गुरुजन ही हैं। यदि वे मारे जाते हैं, तो हमारी सम्पत्ति रक्त से सन जाएगी।

शास्त्रीय विधानों के अनुसार, जो गुरु किसी निन्दनीय कृत्य में प्रवृत्त होता है और जिसने अपना विवेक खो दिया है, वह त्याग देने योग्य है। भीष्म तथा द्रोण को दुर्योधन की आर्थिक सहायता के कारण उसका पक्ष ग्रहण करने को विवश होना पड़ा, यद्यपि उन्हें केवल आर्थिक विचारों से ऐसा स्थान स्वीकार नहीं करना चाहिए था। ऐसी परिस्थितियों में वे गुरुओं की आदरणीयता खो चुके हैं। किन्तु अर्जुन यह सोचते हैं कि फिर भी वे उनके गुरुजन ही बने हुए हैं, और अतएव उन्हें मारकर भौतिक लाभों का भोग करने का अर्थ रक्त से सनी सम्पत्ति का भोग करना होगा।