अध्याय 2 · 41 / 71
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व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरूनन्दन ।
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥ ४१ ॥
व्यवसायात्मिका—दृढ़ कृष्णभावनामृत; बुद्धिः—बुद्धि; एका—केवल एक; इह—इस संसार में; कुरु-नन्दन—हे कुरुओं के प्रिय पुत्र; बहु-शाखाः—विविध शाखाओं वाली; हि—निश्चय ही; अनन्ताः—अनन्त; च—भी; बुद्धयः—बुद्धि; अव्यवसायिनाम्—उनकी जो कृष्णभावनामृत में नहीं हैं।
जो इस मार्ग पर हैं वे संकल्प में दृढ़ हैं, और उनका लक्ष्य एक ही है। हे कुरुओं के प्रिय पुत्र, जो अनिश्चयी हैं उनकी बुद्धि अनेक शाखाओं में बँटी रहती है।
इस प्रकार की दृढ़ श्रद्धा कि मनुष्य को कृष्णभावनामृत के द्वारा जीवन की सर्वोच्च पूर्णता तक उठना चाहिए, व्यवसायात्मिका बुद्धि कहलाती है। चैतन्य-चरितामृत में कहा गया है:
‘śraddhā’-śabde viśvāsa kahe sudṛḍha niścaya
kṛṣṇe bhakti kaile sarva-karma kṛta haya
श्रद्धा का अर्थ है किसी दिव्य वस्तु में अडिग विश्वास। जब मनुष्य कृष्णभावनामृत के कर्तव्यों में संलग्न रहता है, तब उसे भौतिक जगत् के साथ कुल-परम्परा, मानवता अथवा राष्ट्रीयता के दायित्वों के सम्बन्ध में कर्म करने की आवश्यकता नहीं रहती। सकाम कर्म तो पूर्व के शुभ अथवा अशुभ कर्मों की प्रतिक्रियाओं में संलग्नता है। जब मनुष्य कृष्णभावनामृत में जाग्रत हो जाता है, तब उसे अपने कर्मों में शुभ फलों के लिए प्रयत्न करने की आवश्यकता नहीं रहती। जब मनुष्य कृष्णभावनामृत में स्थित होता है, तब समस्त कर्म परम स्तर पर होते हैं, क्योंकि वे शुभ-अशुभ जैसे द्वन्द्वों के अधीन नहीं रहते। कृष्णभावनामृत की सर्वोच्च पूर्णता जीवन की भौतिक धारणा का त्याग है। यह अवस्था उत्तरोत्तर कृष्णभावनामृत के द्वारा स्वतः प्राप्त हो जाती है। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति का दृढ़ संकल्प ज्ञान पर आधारित होता है (“vāsudevaḥ sarvam iti sa mahātmā sudurlabhaḥ”), जिसके द्वारा वह पूर्णतः जान लेता है कि वासुदेव अथवा श्रीकृष्ण ही समस्त प्रकट कारणों के मूल हैं। जैसे वृक्ष की जड़ में डाला गया जल स्वतः ही पत्तियों एवं शाखाओं तक वितरित हो जाता है, उसी प्रकार कृष्णभावनामृत में मनुष्य सभी की—अर्थात् अपनी, परिवार, समाज, राष्ट्र, मानवता आदि की—सर्वोच्च सेवा कर सकता है। यदि मनुष्य के कर्मों से श्रीकृष्ण सन्तुष्ट हों, तो सभी सन्तुष्ट हो जाएँगे।
किन्तु कृष्णभावनामृत में सेवा का सर्वोत्तम अभ्यास ऐसे आध्यात्मिक गुरु के समर्थ मार्गदर्शन में होता है जो श्रीकृष्ण के प्रामाणिक प्रतिनिधि हों, जो शिष्य की प्रकृति को जानते हों और जो उसे कृष्णभावनामृत में कर्म करने का मार्ग दिखा सकें। अतः कृष्णभावनामृत में निपुण होने के लिए मनुष्य को दृढ़तापूर्वक कर्म करना होता है तथा श्रीकृष्ण के प्रतिनिधि का आज्ञापालन करना होता है, और प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु के आदेश को अपने जीवन का ध्येय मानना होता है। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर अपनी प्रसिद्ध गुरु-वन्दना में हमें इस प्रकार उपदेश देते हैं:
yasya prasādād bhagavat-prasādo
yasyāprasādānna gatiḥ kuto ‘pi
dhyāyaṁ stuvaṁs tasya yaśas tri-sandhyaṁ
vande guroḥ śrī-caraṇāravindam.
“आध्यात्मिक गुरु की प्रसन्नता से पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् प्रसन्न होते हैं। और आध्यात्मिक गुरु को प्रसन्न न करने पर कृष्णभावनामृत के स्तर तक उन्नत होने की कोई सम्भावना नहीं रहती। अतः मुझे दिन में तीन बार उनकी कृपा के लिए ध्यान एवं प्रार्थना करनी चाहिए, और अपने उन आध्यात्मिक गुरु को सादर प्रणाम अर्पित करना चाहिए।”
किन्तु यह समूची प्रक्रिया शरीर की धारणा से परे आत्मा के पूर्ण ज्ञान पर निर्भर है—सैद्धान्तिक रूप से नहीं अपितु व्यावहारिक रूप से, जब सकाम कर्मों में प्रकट होने वाली इन्द्रियतृप्ति की कोई सम्भावना शेष नहीं रहती। जो मन में दृढ़तापूर्वक स्थित नहीं होता, वह विविध प्रकार के सकाम कर्मों से विचलित हो जाता है।