अध्याय 2 · 42 / 71
2.42-43
यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः ।
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः ॥ ४२ ॥
कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् ।
क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ॥ ४३ ॥
याम् इमाम्—ये समस्त; पुष्पिताम्—पुष्पित; वाचम्—वचन; प्रवदन्ति—कहते हैं; अविपश्चितः—अल्पज्ञानी मनुष्य; वेद-वाद-रताः—वेदों के तथाकथित अनुयायी; पार्थ—हे पृथापुत्र; न—कभी नहीं; अन्यत्—अन्य कुछ; अस्ति—है; इति—इस प्रकार; वादिनः—पक्षधर; काम-आत्मानः—इन्द्रियतृप्ति के इच्छुक; स्वर्ग-पराः—स्वर्गलोकों की प्राप्ति के लक्ष्य वाले; जन्म-कर्म-फल-प्रदाम्—जिसका फल सकाम कर्म, उत्तम जन्म आदि है; क्रिया-विशेष—आडम्बरपूर्ण अनुष्ठान; बहुलाम्—विविध; भोग—इन्द्रियभोग; ऐश्वर्य—ऐश्वर्य; गतिम्—उन्नति; प्रति—की ओर।
अल्पज्ञानी मनुष्य वेदों के उन पुष्पित वचनों के प्रति अत्यधिक आसक्त रहते हैं, जो स्वर्गलोकों की प्राप्ति, फलस्वरूप उत्तम जन्म, शक्ति आदि के लिए विविध सकाम कर्मों की अनुशंसा करते हैं। इन्द्रियतृप्ति एवं ऐश्वर्यपूर्ण जीवन के इच्छुक होने के कारण वे कहते हैं कि इससे बढ़कर और कुछ नहीं है।
सामान्य लोग अधिक बुद्धिमान् नहीं होते, और अपने अज्ञान के कारण वे वेदों के कर्मकाण्ड-भाग में अनुशंसित सकाम कर्मों के प्रति अत्यधिक आसक्त रहते हैं। वे स्वर्ग में जीवन का भोग करने के इन्द्रियतृप्तिमूलक प्रस्तावों से बढ़कर और कुछ नहीं चाहते, जहाँ मदिरा एवं स्त्रियाँ सुलभ हैं तथा भौतिक ऐश्वर्य अत्यन्त सामान्य बात है। वेदों में स्वर्गलोकों की प्राप्ति के लिए अनेक यज्ञों की अनुशंसा की गई है, विशेषतः ज्योतिष्टोम यज्ञों की। वस्तुतः कहा गया है कि स्वर्गलोकों की प्राप्ति के इच्छुक प्रत्येक मनुष्य को ये यज्ञ करने चाहिए, और अल्पज्ञानी मनुष्य यह सोचते हैं कि यही वैदिक प्रज्ञा का समूचा प्रयोजन है। ऐसे अनुभवहीन मनुष्यों के लिए कृष्णभावनामृत के दृढ़ निश्चित कर्म में स्थित होना अत्यन्त कठिन है। जैसे मूर्ख विषैले वृक्षों के पुष्पों के परिणाम को जाने बिना उन पुष्पों के प्रति आसक्त हो जाते हैं, उसी प्रकार अज्ञानी मनुष्य ऐसे स्वर्गीय ऐश्वर्य तथा उससे प्राप्त इन्द्रियभोग के प्रति आकृष्ट हो जाते हैं।
वेदों के कर्मकाण्ड-भाग में कहा गया है कि जो चातुर्मास्य तप करते हैं वे अमर एवं सदा सुखी होने हेतु सोमरस पीने के अधिकारी हो जाते हैं। इस पृथ्वी पर भी कुछ लोग बलवान् होने तथा इन्द्रियतृप्ति का भोग करने के योग्य बनने हेतु सोमरस पीने के अत्यन्त इच्छुक रहते हैं। ऐसे लोगों को भौतिक बन्धन से मुक्ति में कोई श्रद्धा नहीं होती, और वे वैदिक यज्ञों के आडम्बरपूर्ण अनुष्ठानों के प्रति अत्यधिक आसक्त रहते हैं। वे प्रायः विषयलोलुप होते हैं, और वे जीवन के स्वर्गीय सुखों से अतिरिक्त और कुछ नहीं चाहते। ज्ञात होता है कि नन्दन-कानन नामक उपवन हैं, जिनमें अप्सरा-तुल्य सुन्दर स्त्रियों की संगति तथा प्रचुर सोमरस मदिरा की उपलब्धि का सुअवसर रहता है। ऐसा दैहिक सुख निश्चय ही विषयजनित है; अतः ऐसे लोग हैं जो भौतिक जगत् के स्वामियों के रूप में पूर्णतया भौतिक, क्षणभंगुर सुख के प्रति आसक्त रहते हैं।