हि

अध्याय 2 · 43 / 71

2.44

भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् ।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥ ४४ ॥

भोग—भौतिक भोग; ऐश्वर्य—ऐश्वर्य; प्रसक्तानाम्—जो इस प्रकार आसक्त हैं उनकी; तया—ऐसी वस्तुओं से; अपहृत-चेतसाम्—मन में मोहित हुए; व्यवसायात्मिका—दृढ़ निश्चय वाली; बुद्धिः—भगवान् की भक्ति; समाधौ—नियन्त्रित मन में; न—कभी नहीं; विधीयते—होती है।

जो इन्द्रियभोग एवं भौतिक ऐश्वर्य के प्रति अत्यधिक आसक्त हैं, और जो ऐसी वस्तुओं से मोहित हैं, उनके मन में परमेश्वर की भक्ति का दृढ़ निश्चय नहीं होता।

समाधि का अर्थ है “स्थिर मन”। वैदिक कोश निरुक्ति में कहा गया है, samyag ādhīyate ‘sminn ātmatattva-yāthātmyam: “जब मन आत्मा को समझने के लिए स्थिर होता है, तब वह समाधि कहलाती है।” भौतिक इन्द्रियभोग में रुचि रखने वाले व्यक्तियों के लिए, अथवा ऐसी क्षणभंगुर वस्तुओं से मोहित व्यक्तियों के लिए समाधि कभी सम्भव नहीं होती। वे भौतिक ऊर्जा की प्रक्रिया के द्वारा न्यूनाधिक रूप से दण्डित होते हैं।