अध्याय 2 · 45 / 71
2.46
यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके ।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥ ४६ ॥
यावान्—वह सब; अर्थः—प्रयोजन है; उदपाने—जल के कूप में; सर्वतः—सब प्रकार से; सम्प्लुत-उदके—जल के विशाल जलाशय में; तावान्—उसी प्रकार; सर्वेषु—समस्त; वेदेषु—वैदिक साहित्य में; ब्राह्मणस्य—उस मनुष्य का जो परब्रह्म को जानता है; विजानतः—पूर्ण ज्ञान वाले का।
जो समस्त प्रयोजन एक लघु सरोवर से सिद्ध होते हैं, वे एक ही बार में विशाल जलाशयों से सिद्ध हो जाते हैं। इसी प्रकार, वेदों के समस्त प्रयोजन उस मनुष्य के लिए सिद्ध हो जाते हैं जो उनके पीछे निहित प्रयोजन को जानता है।
वैदिक साहित्य के कर्मकाण्ड-भाग में वर्णित कर्मकाण्ड एवं यज्ञ आत्म-साक्षात्कार के क्रमिक विकास को प्रोत्साहित करने के लिए हैं। और आत्म-साक्षात्कार का प्रयोजन भगवद्गीता के पन्द्रहवें अध्याय (15.15) में स्पष्ट रूप से कहा गया है: वेदों के अध्ययन का प्रयोजन भगवान् श्रीकृष्ण को जानना है, जो प्रत्येक वस्तु के आदि कारण हैं। अतः आत्म-साक्षात्कार का अर्थ है श्रीकृष्ण को समझना तथा उनके साथ अपने नित्य सम्बन्ध को समझना। जीवों का श्रीकृष्ण के साथ सम्बन्ध भी भगवद्गीता के पन्द्रहवें अध्याय में वर्णित है। जीव श्रीकृष्ण के अंश हैं; अतः व्यष्टि जीव के द्वारा कृष्णभावनामृत का पुनरुत्थान ही वैदिक ज्ञान की सर्वोच्च पूर्ण अवस्था है। इसकी पुष्टि श्रीमद्भागवत (3.33.7) में इस प्रकार होती है:
aho bata śvapaco’to garīyān
yaj-jihvāgre vartate nāma tubhyam
tepus tapas te juhuvuḥ sasnur āryā
brahmānūcur nāma gṛṇanti ye te.
“हे भगवन्, जो व्यक्ति आपके पवित्र नाम का कीर्तन कर रहा है, वह यद्यपि चाण्डाल [श्वपच] जैसे नीच कुल में उत्पन्न हो, तथापि आत्म-साक्षात्कार के सर्वोच्च स्तर पर स्थित है। ऐसे व्यक्ति ने अवश्य ही समस्त तीर्थस्थानों में स्नान करने के पश्चात् वैदिक कर्मकाण्डों के अनुसार सभी प्रकार के तप एवं यज्ञ सम्पन्न किए होंगे तथा वैदिक साहित्य का बारम्बार अध्ययन किया होगा। ऐसा व्यक्ति आर्य कुल में श्रेष्ठ माना जाता है।” अतः मनुष्य को इतना बुद्धिमान् होना चाहिए कि वह केवल कर्मकाण्डों के प्रति आसक्त हुए बिना वेदों के प्रयोजन को समझ सके, और उसे इन्द्रियतृप्ति की उत्तम कोटि के लिए स्वर्गीय राज्यों तक उठने की इच्छा नहीं करनी चाहिए। इस युग में सामान्य मनुष्य के लिए वैदिक कर्मकाण्डों तथा वेदान्तों एवं उपनिषदों के समस्त नियमों एवं विधानों का पालन करना सम्भव नहीं है। वेदों के प्रयोजनों को सम्पन्न करने में बहुत समय, ऊर्जा, ज्ञान एवं साधन लगते हैं। इस युग में यह प्रायः सम्भव नहीं है। किन्तु वैदिक संस्कृति का सर्वोत्तम प्रयोजन भगवान् के पवित्र नाम के कीर्तन से सिद्ध होता है, जैसा कि समस्त पतित आत्माओं के उद्धारक भगवान् चैतन्य ने अनुशंसित किया है। जब भगवान् चैतन्य से एक महान् वैदिक विद्वान् प्रकाशानन्द सरस्वती ने पूछा कि वे, भगवान्, वेदान्त दर्शन के अध्ययन के स्थान पर एक भावुक व्यक्ति की भाँति भगवान् के पवित्र नाम का कीर्तन क्यों कर रहे हैं, तब भगवान् ने उत्तर दिया कि उनके आध्यात्मिक गुरु ने उन्हें महामूर्ख पाया था, और इसलिए उन्होंने उन्हें भगवान् श्रीकृष्ण के पवित्र नाम का कीर्तन करने को कहा। उन्होंने वैसा ही किया, और एक उन्मत्त की भाँति आनन्दविभोर हो गए। इस कलियुग में अधिकांश जनसंख्या मूर्ख है तथा वेदान्त दर्शन को समझने के लिए पर्याप्त शिक्षित नहीं है; वेदान्त दर्शन का सर्वोत्तम प्रयोजन भगवान् के पवित्र नाम के निरपराध कीर्तन से सिद्ध होता है। वेदान्त वैदिक प्रज्ञा का अन्तिम वचन है, और वेदान्त दर्शन के रचयिता एवं ज्ञाता भगवान् श्रीकृष्ण हैं; और सर्वोच्च वेदान्ती वह महान् आत्मा है जो भगवान् के पवित्र नाम के कीर्तन में आनन्द लेती है। यही समस्त वैदिक रहस्यवाद का परम प्रयोजन है।