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अध्याय 2 · 46 / 71

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कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥ ४७ ॥

कर्मणि—विहित कर्तव्यों में; एव—निश्चय ही; अधिकारः—अधिकार; ते—तुम्हारा; मा—कभी नहीं; फलेषु—फलों में; कदाचन—किसी भी समय; मा—कभी नहीं; कर्म-फल—कर्म के फल में; हेतुः—कारण; भूः—बनो; मा—कभी नहीं; ते—तुम्हारी; सङ्गः—आसक्ति; अस्तु—हो; अकर्मणि—न करने में।

तुम्हें अपना विहित कर्तव्य करने का अधिकार है, किन्तु तुम कर्म के फलों के अधिकारी नहीं हो। स्वयं को अपने कर्मों के फलों का कारण कभी मत समझो, और अपना कर्तव्य न करने के प्रति कभी आसक्त मत होओ।

यहाँ तीन विचारणीय बातें हैं: विहित कर्तव्य, स्वेच्छाचारी कर्म तथा अकर्म। विहित कर्तव्य उन कर्मों को इंगित करते हैं जो मनुष्य भौतिक प्रकृति के गुणों में रहते हुए करता है। स्वेच्छाचारी कर्म का अर्थ है अधिकारी की स्वीकृति के बिना किए गए कर्म, और अकर्म का अर्थ है अपने विहित कर्तव्यों को न करना। भगवान् ने अर्जुन को यह उपदेश दिया कि वे अकर्मण्य न हों, अपितु फल के प्रति आसक्त हुए बिना अपना विहित कर्तव्य करें। जो अपने कर्म के फल के प्रति आसक्त है, वही कर्म का कारण भी है। अतः वही ऐसे कर्मों के फल का भोक्ता अथवा भोगी होता है।

जहाँ तक विहित कर्तव्यों का प्रश्न है, उन्हें तीन उपविभागों में रखा जा सकता है, अर्थात् नित्य कर्म, आपात्कालीन कर्म तथा वांछित कर्म। नित्य कर्म, शास्त्रीय विधानों के अनुसार, फल की इच्छा के बिना किया जाता है। चूँकि मनुष्य को इसे करना ही होता है, अतः अनिवार्य कर्म सत्त्वगुण में कर्म है। फलयुक्त कर्म बन्धन का कारण बनता है; अतः ऐसा कर्म शुभ नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति का विहित कर्तव्यों के विषय में स्वामित्व का अधिकार है, किन्तु उसे फल के प्रति आसक्ति के बिना कर्म करना चाहिए; ऐसे निष्काम अनिवार्य कर्तव्य नि:सन्देह मनुष्य को मुक्ति के मार्ग की ओर ले जाते हैं।

अतः भगवान् ने अर्जुन को यह उपदेश दिया कि वे कर्तव्य के रूप में फल के प्रति आसक्ति के बिना युद्ध करें। युद्ध में उनका सम्मिलित न होना आसक्ति का ही दूसरा पक्ष है। ऐसी आसक्ति मनुष्य को कभी मुक्ति के मार्ग की ओर नहीं ले जाती। कोई भी आसक्ति, चाहे अनुकूल हो या प्रतिकूल, बन्धन का कारण है। अकर्म पापमय है। अतः कर्तव्य के रूप में युद्ध करना ही अर्जुन के लिए मुक्ति का एकमात्र शुभ मार्ग था।