अध्याय 2 · 47 / 71
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योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय ।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥ ४८ ॥
योग-स्थः—योग में स्थिर; कुरु—करो; कर्माणि—अपना कर्तव्य; सङ्गम्—आसक्ति; त्यक्त्वा—त्यागकर; धनञ्जय—हे धनञ्जय; सिद्धि-असिद्ध्योः—सफलता एवं असफलता में; समः—समान; भूत्वा—होकर; समत्वम्—मन की समता; योगः—योग; उच्यते—कहलाती है।
हे अर्जुन, योग में स्थिर रहो। अपना कर्तव्य करो और सफलता अथवा असफलता के प्रति समस्त आसक्ति का त्याग कर दो। मन की ऐसी समता योग कहलाती है।
श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि उन्हें योग में कर्म करना चाहिए। और वह योग क्या है? योग का अर्थ है निरन्तर विचलित करने वाली इन्द्रियों को नियन्त्रित करके मन को परमेश्वर पर एकाग्र करना। और परम कौन है? परम तो भगवान् हैं। और चूँकि वे स्वयं अर्जुन को युद्ध करने का आदेश दे रहे हैं, अतः अर्जुन का युद्ध के फलों से कोई सम्बन्ध नहीं है। लाभ अथवा विजय श्रीकृष्ण की चिन्ता है; अर्जुन को तो केवल यह उपदेश दिया जाता है कि वे श्रीकृष्ण के आदेश के अनुसार कर्म करें। श्रीकृष्ण के आदेश का पालन ही वास्तविक योग है, और इसका अभ्यास कृष्णभावनामृत नामक प्रक्रिया में किया जाता है। केवल कृष्णभावनामृत के द्वारा ही मनुष्य स्वामित्व के भाव का त्याग कर सकता है। मनुष्य को श्रीकृष्ण का सेवक, अथवा श्रीकृष्ण के सेवक का सेवक बनना होता है। कृष्णभावनामृत में कर्तव्य निर्वाह करने की यही उचित रीति है, जो अकेली ही मनुष्य को योग में कर्म करने में सहायता कर सकती है।
अर्जुन एक क्षत्रिय हैं, और इस रूप में वे वर्णाश्रम-धर्म की संस्था में सम्मिलित हैं। विष्णु पुराण में कहा गया है कि वर्णाश्रम-धर्म में समूचा लक्ष्य विष्णु को सन्तुष्ट करना है। किसी को स्वयं को सन्तुष्ट नहीं करना चाहिए, जैसा कि भौतिक जगत् में नियम है, अपितु मनुष्य को श्रीकृष्ण को सन्तुष्ट करना चाहिए। अतः जब तक मनुष्य श्रीकृष्ण को सन्तुष्ट नहीं करता, तब तक वह वर्णाश्रम-धर्म के सिद्धान्तों का सम्यक् पालन नहीं कर सकता। परोक्ष रूप से अर्जुन को यह उपदेश दिया गया कि वे वैसे ही कर्म करें जैसा श्रीकृष्ण ने उनसे कहा।