हि

अध्याय 2 · 48 / 71

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दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय ।
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ॥ ४९ ॥

दूरेण—इसे बहुत दूर हटाकर; हि—निश्चय ही; अवरम्—निन्दनीय; कर्म—कर्म; बुद्धि-योगात्—कृष्णभावनामृत के बल पर; धनञ्जय—हे धनञ्जय; बुद्धौ—ऐसी भावना में; शरणम्—पूर्ण शरणागति; अन्विच्छ—इच्छा करो; कृपणाः—कृपण; फल-हेतवः—जो सकाम कर्म की इच्छा करते हैं।

हे धनञ्जय, भक्ति के द्वारा स्वयं को समस्त सकाम कर्मों से मुक्त करो, और उसी भावना में पूर्णतः शरणागत हो जाओ। जो अपने कर्म के फलों का भोग करना चाहते हैं वे कृपण हैं।

जिसने वास्तव में अपनी स्वाभाविक स्थिति को भगवान् के नित्य सेवक के रूप में समझ लिया है, वह कृष्णभावनामृत में कर्म करने के अतिरिक्त समस्त संलग्नताओं का त्याग कर देता है। जैसा पहले समझाया जा चुका है, बुद्धियोग का अर्थ है भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा। ऐसी भक्ति ही जीव के लिए उचित कर्ममार्ग है। केवल कृपण ही अपने कर्म के फल का भोग करना चाहते हैं, जिससे वे भौतिक बन्धन में और अधिक उलझ जाएँ। कृष्णभावनामृत में कर्म के अतिरिक्त, समस्त कर्म निन्दनीय हैं, क्योंकि वे कर्ता को निरन्तर जन्म-मृत्यु के चक्र में बाँधे रखते हैं। अतः मनुष्य को कभी कर्म का कारण बनने की इच्छा नहीं करनी चाहिए। प्रत्येक कार्य श्रीकृष्ण की सन्तुष्टि के लिए कृष्णभावनामृत में किया जाना चाहिए। कृपण यह नहीं जानते कि सौभाग्य से अथवा कठोर श्रम से प्राप्त धन-सम्पत्ति का किस प्रकार उपयोग किया जाए। मनुष्य को अपनी समस्त ऊर्जा कृष्णभावनामृत में कर्म करते हुए लगानी चाहिए, और इससे उसका जीवन सफल हो जाएगा। कृपणों की भाँति, अभागे मनुष्य अपनी मानवीय ऊर्जा को भगवान् की सेवा में नहीं लगाते।