अध्याय 2 · 49 / 71
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बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥ ५० ॥
बुद्धि-युक्तः—जो भक्ति में संलग्न है; जहाति—से छुटकारा पा सकता है; इह—इस जीवन में; उभे—दोनों में; सुकृत-दुष्कृते—शुभ एवं अशुभ फलों में; तस्मात्—अतः; योगाय—भक्ति के लिए; युज्यस्व—इस प्रकार संलग्न होओ; योगः—कृष्णभावनामृत; कर्मसु—समस्त कर्मों में; कौशलम्—कला।
भक्ति में संलग्न मनुष्य इसी जीवन में शुभ एवं अशुभ दोनों प्रकार के कर्मों से छुटकारा पा लेता है। अतः हे अर्जुन, योग के लिए प्रयत्न करो, जो समस्त कर्म की कला है।
अनादि काल से प्रत्येक जीव ने अपने शुभ एवं अशुभ कर्म की विविध प्रतिक्रियाएँ संचित की हैं। इस प्रकार वह निरन्तर अपनी वास्तविक स्वाभाविक स्थिति से अनभिज्ञ रहता है। मनुष्य का यह अज्ञान भगवद्गीता के उपदेश से दूर हो सकता है, जो उसे यह सिखाती है कि वह सब प्रकार से भगवान् श्रीकृष्ण के शरणागत हो जाए और जन्म-जन्मान्तर के कर्म-प्रतिक्रिया के परतन्त्र दमन से मुक्त हो जाए। अतः अर्जुन को कृष्णभावनामृत में कर्म करने का उपदेश दिया जाता है, जो फलयुक्त कर्म की शुद्धिकारक प्रक्रिया है।