हि

अध्याय 2 · 6 / 71

2.6

न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो
यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः ।
यानेव हत्वा न जिजीविषाम-
स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥ ६ ॥

न—न तो; च—भी; एतत्—यह; विद्मः—जानते हैं; कतरत्—कौन; नः—हमारे लिए; गरीयः—श्रेयस्कर; यत्—जो; वा—अथवा; जयेम—हम जीतें; यदि—यदि; वा—अथवा; नः—हमें; जयेयुः—वे जीतें; यान्—जिन्हें; एव—निश्चय ही; हत्वा—मारकर; न—कभी नहीं; जिजीविषामः—जीना चाहते हैं; ते—वे सब; अवस्थिताः—स्थित हैं; प्रमुखे—सम्मुख; धार्तराष्ट्राः—धृतराष्ट्र के पुत्र।

और न ही हम यह जानते हैं कि कौन-सा श्रेयस्कर है—उन्हें जीतना अथवा उनके द्वारा जीते जाना। धृतराष्ट्र के पुत्र, जिन्हें मारकर हम जीना नहीं चाहेंगे, इस समय इस युद्धभूमि में हमारे सम्मुख खड़े हैं।

अर्जुन नहीं जानते थे कि उन्हें युद्ध करके अनावश्यक हिंसा का जोखिम उठाना चाहिए, यद्यपि युद्ध करना क्षत्रियों का कर्तव्य है, अथवा उन्हें युद्ध से विरत होकर भिक्षा माँगकर जीना चाहिए। यदि वे शत्रु को न जीतते, तो भिक्षा माँगना ही उनके जीविकोपार्जन का एकमात्र साधन होता। न ही विजय की कोई निश्चितता थी, क्योंकि कोई भी पक्ष विजयी हो सकता था। यदि विजय उनकी प्रतीक्षा भी कर रही होती (और उनका पक्ष न्यायोचित था), तब भी, यदि धृतराष्ट्र के पुत्र युद्ध में मारे जाते, तो उनके अभाव में जीना अत्यन्त कठिन होता। ऐसी परिस्थितियों में, वह उनके लिए एक अन्य प्रकार की पराजय ही होती। अर्जुन के ये समस्त विचार निश्चित रूप से सिद्ध करते हैं कि वे न केवल भगवान् के महान् भक्त थे, अपितु अत्यन्त प्रबुद्ध भी थे, और उनका अपने मन तथा इन्द्रियों पर पूर्ण नियन्त्रण था। राजकुल में जन्म लेने पर भी भिक्षा माँगकर जीने की उनकी इच्छा अनासक्ति का एक अन्य लक्षण है। वे वस्तुतः सद्गुणी थे, जैसा कि ये गुण, श्रीकृष्ण (उनके गुरुदेव) के उपदेश-वचनों में उनकी श्रद्धा के साथ मिलकर, सूचित करते हैं। निष्कर्ष यह है कि अर्जुन मोक्ष के पूर्णतः योग्य थे। जब तक इन्द्रियाँ वशीभूत न हों, तब तक ज्ञान के स्तर तक उन्नति का कोई अवसर नहीं रहता, और ज्ञान तथा भक्ति के बिना मोक्ष का कोई अवसर नहीं रहता। अर्जुन अपने भौतिक सम्बन्धों में अपने विशाल गुणों के अतिरिक्त इन समस्त गुणों में भी समर्थ थे।