हि

अध्याय 2 · 50 / 71

2.51

कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः ।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥ ५१ ॥

कर्म-जम्—सकाम कर्मों के कारण; बुद्धि-युक्ताः—भक्ति में किया जाने वाला; हि—निश्चय ही; फलम्—फल; त्यक्त्वा—त्यागकर; मनीषिणः—भक्त जो महान् ऋषि हैं; जन्म-बन्ध—जन्म-मृत्यु का बन्धन; विनिर्मुक्ताः—मुक्त आत्माएँ; पदम्—पद; गच्छन्ति—प्राप्त करते हैं; अनामयम्—दुःखों से रहित।

भक्ति में संलग्न बुद्धिमान् जन भगवान् की शरण लेते हैं, और भौतिक जगत् में कर्म के फलों का त्याग करके स्वयं को जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त कर लेते हैं। इस प्रकार वे समस्त दुःखों से परे उस अवस्था को प्राप्त कर सकते हैं।

मुक्त जीव उस स्थान की खोज करते हैं जहाँ कोई भौतिक दुःख नहीं होता। श्रीमद्भागवत में कहा गया है:

samāśritā ye padapallava-plavaṁ

mahat-padaṁ puṇya-yaśo murāreḥ

bhāvambudhir vatsa-padaṁ paraṁ padaṁ

paraṁ padaṁ yad vipadāṁ na teṣām

(भा. 10.14.58)

“जिसने भगवान् के चरण-कमलरूपी नौका को स्वीकार कर लिया है, जो विश्व-प्रकटीकरण के आश्रय हैं और मुकुन्द अथवा मुक्ति के दाता के रूप में प्रसिद्ध हैं, उसके लिए भौतिक जगत् का महासागर बछड़े के खुर के चिह्न में भरे जल के समान है। परम पदम् अथवा वह स्थान जहाँ कोई भौतिक दुःख नहीं है, अर्थात् वैकुण्ठ, उसका लक्ष्य है, न कि वह स्थान जहाँ जीवन के प्रत्येक पग पर संकट है।”

अज्ञानवश मनुष्य यह नहीं जानता कि यह भौतिक जगत् एक दुःखमय स्थान है, जहाँ पग-पग पर संकट हैं। केवल अज्ञानवश ही अल्पबुद्धि मनुष्य सकाम कर्मों के द्वारा इस स्थिति से समझौता करने का प्रयत्न करते हैं, यह सोचते हुए कि फलयुक्त कर्म उन्हें सुखी बना देंगे। वे यह नहीं जानते कि ब्रह्माण्ड में कहीं भी किसी प्रकार का भौतिक शरीर दुःखरहित जीवन नहीं दे सकता। जीवन के दुःख, अर्थात् जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था एवं रोग, भौतिक जगत् में सर्वत्र विद्यमान हैं। किन्तु जो अपनी वास्तविक स्वाभाविक स्थिति को भगवान् के नित्य सेवक के रूप में समझ लेता है, और इस प्रकार पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की स्थिति को जान लेता है, वह स्वयं को भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा में संलग्न कर देता है। फलस्वरूप वह वैकुण्ठलोकों में प्रवेश करने के योग्य हो जाता है, जहाँ न तो भौतिक, दुःखमय जीवन है और न ही काल एवं मृत्यु का प्रभाव। अपनी स्वाभाविक स्थिति को जानने का अर्थ है भगवान् की दिव्य स्थिति को भी जानना। जो भूल से यह सोचता है कि जीव की स्थिति एवं भगवान् की स्थिति एक ही स्तर पर हैं, उसे अन्धकार में स्थित समझना चाहिए और इसलिए वह स्वयं को भगवान् की भक्ति में संलग्न करने में असमर्थ है। वह स्वयं स्वामी बन बैठता है और इस प्रकार जन्म-मृत्यु की पुनरावृत्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। किन्तु जो यह समझकर कि उसकी स्थिति सेवा करने की है, स्वयं को भगवान् की सेवा में स्थानान्तरित कर देता है, वह तत्काल वैकुण्ठलोक के लिए पात्र हो जाता है। भगवान् के निमित्त की जाने वाली सेवा कर्मयोग अथवा बुद्धियोग कहलाती है, अथवा सरल शब्दों में, भगवान् की भक्ति।