अध्याय 2 · 51 / 71
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यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति ।
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥ ५२ ॥
यदा—जब; ते—तुम्हारी; मोह—मोहमयी; कलिलम्—सघन वन; बुद्धिः—बुद्धि सहित दिव्य सेवा; व्यतितरिष्यति—पार कर जाती है; तदा—उस समय; गन्तासि—तुम जाओगे; निर्वेदम्—उदासीनता; श्रोतव्यस्य—जो कुछ सुना जाना है; श्रुतस्य—जो कुछ पहले ही सुना जा चुका है; च—भी।
जब तुम्हारी बुद्धि मोह के सघन वन को पार कर जाएगी, तब तुम जो कुछ सुना जा चुका है और जो कुछ सुना जाना है, उस सबके प्रति उदासीन हो जाओगे।
भगवान् के महान् भक्तों के जीवन में ऐसे अनेक उत्तम उदाहरण हैं जो केवल भगवान् की भक्ति के द्वारा ही वेदों के कर्मकाण्डों के प्रति उदासीन हो गए। जब कोई व्यक्ति वास्तव में श्रीकृष्ण को तथा श्रीकृष्ण के साथ अपने सम्बन्ध को समझ लेता है, तब वह यद्यपि अनुभवी ब्राह्मण भी हो, सकाम कर्मों के कर्मकाण्डों के प्रति स्वाभाविक रूप से पूर्णतया उदासीन हो जाता है। भक्तों की परम्परा में एक महान् भक्त एवं आचार्य श्री माधवेन्द्र पुरी कहते हैं:
sandhyā-vandana bhadram astu bhavato bhoḥ snāna tubhyaṁ namo
bho devāḥ pitaraś ca tarpaṇa-vidhau nāhaṁ kṣamaḥ kṣamyatām
yatra kvāpi niṣadya yādava-kulottamasya kaṁsa-dviṣaḥ
smāraṁ smāram aghaṁ harāmi tad alaṁ manye kim anyena me.
“हे भगवन्, दिन में तीन बार की जाने वाली अपनी प्रार्थनाओं में आपकी जय हो। स्नान करते हुए मैं आपको प्रणाम अर्पित करता हूँ। हे देवगण! हे पितृगण! कृपया मुझे आपको सम्मान अर्पित करने में असमर्थ होने के लिए क्षमा करें। अब मैं जहाँ कहीं भी बैठता हूँ, मैं यदुवंश के उस महान् वंशज [श्रीकृष्ण] का, कंस के शत्रु का स्मरण कर सकता हूँ, और इस प्रकार मैं स्वयं को समस्त पापबन्धन से मुक्त कर सकता हूँ। मेरे विचार से यह मेरे लिए पर्याप्त है।”
वैदिक कर्मकाण्ड एवं अनुष्ठान नवदीक्षितों के लिए अनिवार्य हैं: दिन में तीन बार सब प्रकार की प्रार्थनाओं को समझना, प्रातःकाल शीघ्र स्नान करना, पितृगण को सम्मान अर्पित करना आदि। किन्तु जब मनुष्य पूर्णतः कृष्णभावनामृत में होता है और भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा में संलग्न रहता है, तब वह इन समस्त नियामक सिद्धान्तों के प्रति उदासीन हो जाता है, क्योंकि वह पहले ही पूर्णता प्राप्त कर चुका होता है। यदि मनुष्य परमेश्वर श्रीकृष्ण की सेवा के द्वारा अनुभूति के स्तर तक पहुँच सके, तो उसे प्रकट शास्त्रों में अनुशंसित विभिन्न प्रकार के तप एवं यज्ञ करने की आवश्यकता नहीं रहती। और इसी प्रकार, यदि किसी ने यह नहीं समझा है कि वेदों का प्रयोजन श्रीकृष्ण तक पहुँचना है, और केवल कर्मकाण्डों आदि में संलग्न रहता है, तो वह ऐसी संलग्नताओं में व्यर्थ ही समय गँवाता है। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति शब्द-ब्रह्म अर्थात् वेदों एवं उपनिषदों की सीमा को पार कर जाते हैं।