हि

अध्याय 2 · 52 / 71

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श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला ।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥ ५३ ॥

श्रुति—वैदिक प्रकाशन; विप्रतिपन्ना—वेदों के सकाम फलों से प्रभावित हुए बिना; ते—तुम्हारी; यदा—जब; स्थास्यति—स्थिर रहती है; निश्चला—अविचल; समाधौ—दिव्य चेतना में, अथवा कृष्णभावनामृत में; अचला—अडिग; बुद्धिः—बुद्धि; तदा—उस समय; योगम्—आत्म-साक्षात्कार; अवाप्स्यसि—तुम प्राप्त करोगे।

जब तुम्हारा मन वेदों की पुष्पित भाषा से अब विचलित नहीं होगा, और जब वह आत्म-साक्षात्कार की समाधि में स्थिर रहेगा, तब तुम दिव्य चेतना को प्राप्त कर लोगे।

यह कहना कि मनुष्य समाधि में है, यह कहना है कि उसने पूर्णतया कृष्णभावनामृत का साक्षात्कार कर लिया है; अर्थात्, पूर्ण समाधि में स्थित व्यक्ति ने ब्रह्म, परमात्मा एवं भगवान् का साक्षात्कार कर लिया है। आत्म-साक्षात्कार की सर्वोच्च पूर्णता यह समझना है कि मनुष्य नित्य श्रीकृष्ण का सेवक है और उसका एकमात्र कार्य कृष्णभावनामृत में अपने कर्तव्यों का निर्वाह करना है। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति, अथवा भगवान् के अडिग भक्त को, न तो वेदों की पुष्पित भाषा से विचलित होना चाहिए और न ही स्वर्गीय राज्य की प्राप्ति के लिए सकाम कर्मों में संलग्न होना चाहिए। कृष्णभावनामृत में मनुष्य प्रत्यक्ष रूप से श्रीकृष्ण के सान्निध्य में आ जाता है, और इस प्रकार उस दिव्य अवस्था में श्रीकृष्ण के समस्त निर्देश समझे जा सकते हैं। ऐसे कर्मों से मनुष्य को निश्चय ही फल प्राप्त होते हैं तथा निर्णायक ज्ञान प्राप्त होता है। मनुष्य को केवल श्रीकृष्ण के अथवा उनके प्रतिनिधि आध्यात्मिक गुरु के आदेशों का पालन करना है।