अध्याय 2 · 53 / 71
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अर्जुन उवाच
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ॥ ५४ ॥
अर्जुन उवाच—अर्जुन ने कहा; स्थित-प्रज्ञस्य—उसका जो दृढ़ कृष्णभावनामृत में स्थित है; का—क्या; भाषा—भाषा; समाधि-स्थस्य—समाधि में स्थित का; केशव—हे श्रीकृष्ण; स्थित-धीः—जो कृष्णभावनामृत में स्थिर है; किम्—क्या; प्रभाषेत—बोलता है; किम्—कैसे; आसीत—रहता है; व्रजेत—चलता है; किम्—कैसे।
अर्जुन ने कहा: हे केशव, जिसकी चेतना इस प्रकार दिव्यता में लीन हो जाती है, उसके लक्षण क्या हैं? वह किस प्रकार बोलता है, और उसकी भाषा क्या है? वह किस प्रकार बैठता है, और किस प्रकार चलता है?
जैसे प्रत्येक मनुष्य के, उसकी विशेष स्थिति के अनुसार, लक्षण होते हैं, उसी प्रकार जो कृष्णभावनाभावित है उसका भी अपना विशेष स्वभाव होता है—बोलना, चलना, सोचना, अनुभव करना आदि। जैसे एक धनवान् मनुष्य के अपने लक्षण होते हैं, जिनसे वह धनवान् के रूप में जाना जाता है, जैसे एक रोगी मनुष्य के अपने लक्षण होते हैं, जिनसे वह रोगी के रूप में जाना जाता है, अथवा जैसे एक विद्वान् मनुष्य के अपने लक्षण होते हैं, उसी प्रकार श्रीकृष्ण की दिव्य चेतना में स्थित मनुष्य के विविध व्यवहारों में विशिष्ट लक्षण होते हैं। उसके विशिष्ट लक्षणों को मनुष्य भगवद्गीता से जान सकता है। सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि कृष्णभावनाभावित मनुष्य किस प्रकार बोलता है, क्योंकि वाणी किसी भी मनुष्य का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण गुण है। कहा जाता है कि जब तक मूर्ख बोलता नहीं, तब तक वह अप्रकट रहता है, और निश्चय ही एक सुसज्जित मूर्ख की पहचान तब तक नहीं होती जब तक वह बोलता नहीं, किन्तु ज्यों ही वह बोलता है, वह तत्काल स्वयं को प्रकट कर देता है। कृष्णभावनाभावित मनुष्य का तत्काल लक्षण यह है कि वह केवल श्रीकृष्ण की तथा उनसे सम्बन्धित विषयों की बात करता है। तब अन्य लक्षण स्वतः ही अनुसरण करते हैं, जैसा कि नीचे कहा गया है।