हि

अध्याय 2 · 54 / 71

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श्रीभगवानुवाच
प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् ।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥ ५५ ॥

श्री भगवान् उवाच—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने कहा; प्रजहाति—त्याग देता है; यदा—जब; कामान्—इन्द्रियतृप्ति की इच्छाएँ; सर्वान्—सब प्रकार की; पार्थ—हे पृथापुत्र; मनः-गतान्—मानसिक कल्पना की; आत्मनि—आत्मा की शुद्ध अवस्था में; एव—निश्चय ही; आत्मना—शुद्ध मन के द्वारा; तुष्टः—सन्तुष्ट; स्थित-प्रज्ञः—दिव्य रूप से स्थित; तदा—उस समय; उच्यते—कहा जाता है।

श्रीभगवान् ने कहा: हे पार्थ, जब मनुष्य मानसिक कल्पना से उत्पन्न होने वाली सब प्रकार की इन्द्रिय-इच्छाओं का त्याग कर देता है, और जब उसका मन केवल आत्मा में ही सन्तोष पाता है, तब वह शुद्ध दिव्य चेतना में स्थित कहा जाता है।

श्रीमद्भागवत यह पुष्टि करता है कि जो भी व्यक्ति पूर्णतः कृष्णभावनामृत में, अथवा भगवान् की भक्ति में स्थित है, उसमें महान् ऋषियों के समस्त सद्गुण होते हैं, जबकि जो व्यक्ति इस प्रकार दिव्य रूप से स्थित नहीं है उसमें कोई सद्गुण नहीं होता, क्योंकि वह निश्चय ही अपनी मानसिक कल्पनाओं में शरण लेता रहता है। फलस्वरूप यहाँ ठीक ही कहा गया है कि मनुष्य को मानसिक कल्पना द्वारा निर्मित सब प्रकार की इन्द्रिय-इच्छाओं का त्याग करना होता है। ऐसी इन्द्रिय-इच्छाओं को कृत्रिम रूप से रोका नहीं जा सकता। किन्तु यदि मनुष्य कृष्णभावनामृत में संलग्न हो, तो स्वतः ही, बाह्य प्रयासों के बिना, इन्द्रिय-इच्छाएँ शान्त हो जाती हैं। अतः मनुष्य को बिना किसी हिचकिचाहट के स्वयं को कृष्णभावनामृत में संलग्न करना चाहिए, क्योंकि यह भक्ति तत्काल मनुष्य को दिव्य चेतना के स्तर तक पहुँचने में सहायता करेगी। अत्यन्त उन्नत आत्मा स्वयं को परमेश्वर के नित्य सेवक के रूप में अनुभव करके सदा अपने में ही सन्तुष्ट रहती है। ऐसा दिव्य रूप से स्थित व्यक्ति तुच्छ भौतिकता से उत्पन्न होने वाली इन्द्रिय-इच्छाओं से रहित रहता है; अपितु वह परमेश्वर की नित्य सेवा करने की अपनी स्वाभाविक स्थिति में सदा सुखी रहता है।