हि

अध्याय 2 · 55 / 71

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दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थिधीर्मुनिरुच्यते ॥ ५६ ॥

duḥkheṣu—त्रिविध दुःखों में; anudvigna-manāḥ—मन में विचलित हुए बिना; sukheṣu—सुख में; vigata-spṛhaḥ—अत्यधिक रुचि के बिना; vīta—मुक्त; rāga—आसक्ति; bhaya—भय; krodhaḥ—क्रोध; sthita-dhīḥ—जो स्थिरबुद्धि है; muniḥ—मुनि; ucyate—कहा जाता है।

जो त्रिविध दुःखों के होते हुए भी विचलित नहीं होता, जो सुख के समय हर्षित नहीं होता, तथा जो आसक्ति, भय और क्रोध से मुक्त है, वह स्थिरबुद्धि मुनि कहलाता है।

मुनि शब्द का अर्थ है ऐसा व्यक्ति जो किसी तथ्यपूर्ण निष्कर्ष पर पहुँचे बिना मानसिक कल्पना के लिए अपने मन को विविध प्रकार से उद्वेलित कर सकता है। कहा जाता है कि प्रत्येक मुनि का दृष्टिकोण भिन्न होता है, और जब तक कोई मुनि अन्य मुनियों से भिन्न न हो, तब तक उसे शब्द के यथार्थ अर्थ में मुनि नहीं कहा जा सकता। नासौ मुनिर्यस्य मतं न भिन्नम्। किन्तु जिस स्थितधी-मुनि का उल्लेख यहाँ भगवान् करते हैं, वह एक सामान्य मुनि से भिन्न है। स्थितधी-मुनि सदा कृष्णभावनामृत में स्थित रहता है, क्योंकि उसने सृजनात्मक कल्पना का अपना समस्त कार्य समाप्त कर लिया है। वह मानसिक कल्पनाओं की अवस्था को पार कर चुका है और इस निष्कर्ष पर पहुँच चुका है कि भगवान् श्रीकृष्ण, अथवा वासुदेव, ही सब कुछ हैं। उसे स्थिरमना मुनि कहा जाता है। ऐसा पूर्णतः कृष्णभावनाभावित व्यक्ति त्रिविध दुःखों के आघातों से तनिक भी विचलित नहीं होता, क्योंकि वह समस्त दुःखों को भगवान् की कृपा के रूप में स्वीकार करता है, और अपने को अपने पूर्व दुष्कर्मों के कारण और भी अधिक कष्ट के योग्य मानता है; तथा वह देखता है कि भगवान् की कृपा से उसके दुःख न्यूनतम सीमा तक घट जाते हैं। इसी प्रकार जब वह सुखी होता है, तब वह उसका श्रेय भगवान् को देता है, और स्वयं को उस सुख के अयोग्य मानता है; वह अनुभव करता है कि केवल भगवान् की कृपा से ही वह इतनी सुखद अवस्था में है और भगवान् की उत्तम सेवा करने में समर्थ है। और भगवान् की सेवा के लिए वह सदा साहसी एवं सक्रिय रहता है, तथा आसक्ति अथवा द्वेष से प्रभावित नहीं होता। आसक्ति का अर्थ है वस्तुओं को अपनी इन्द्रियतृप्ति के लिए स्वीकार करना, और अनासक्ति ऐसी ऐन्द्रिय आसक्ति का अभाव है। किन्तु जो कृष्णभावनामृत में स्थित है, उसमें न आसक्ति होती है न अनासक्ति, क्योंकि उसका जीवन भगवान् की सेवा में समर्पित है। फलतः अपने प्रयत्नों के असफल होने पर भी वह तनिक भी क्रोधित नहीं होता। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति अपने संकल्प में सदा अडिग रहता है।