अध्याय 2 · 56 / 71
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यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् ।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ५७ ॥
yaḥ—जो; sarvatra—सर्वत्र; anabhisnehaḥ—स्नेह के बिना; tat—वह; tat—वह; prāpya—प्राप्त करके; śubha—शुभ; aśubham—अशुभ; na—कभी नहीं; abhinandati—प्रशंसा करता है; na—कभी नहीं; dveṣṭi—द्वेष करता है; tasya—उसका; prajñā—पूर्ण ज्ञान; pratiṣṭhita—स्थिर।
जो आसक्ति से रहित है, जो शुभ की प्राप्ति पर हर्षित नहीं होता और न अशुभ की प्राप्ति पर शोक करता है, वह पूर्ण ज्ञान में दृढ़तापूर्वक स्थित है।
भौतिक जगत् में सदा कुछ-न-कुछ उथल-पुथल होती रहती है, जो शुभ अथवा अशुभ हो सकती है। जो ऐसी भौतिक उथल-पुथल से विचलित नहीं होता, जो शुभ और अशुभ से अप्रभावित रहता है, उसे कृष्णभावनामृत में स्थित समझना चाहिए। जब तक मनुष्य भौतिक जगत् में है, तब तक शुभ और अशुभ की सम्भावना सदा बनी रहती है, क्योंकि यह जगत् द्वैत से परिपूर्ण है। किन्तु जो कृष्णभावनामृत में स्थित है, वह शुभ और अशुभ से प्रभावित नहीं होता, क्योंकि उसका सम्बन्ध केवल श्रीकृष्ण से है, जो परम मंगलमय एवं निरपेक्ष हैं। श्रीकृष्ण के प्रति ऐसी चेतना मनुष्य को एक पूर्ण दिव्य स्थिति में स्थापित कर देती है, जिसे तकनीकी रूप से समाधि कहा जाता है।