अध्याय 2 · 57 / 71
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यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ५८ ॥
yadā—जब; saṁharate—समेट लेता है; ca—भी; ayam—ये सब; kūrmaḥ—कछुआ; aṅgāni—अंग; iva—के समान; sarvaśaḥ—पूर्णतः; indriyāni—इन्द्रियाँ; indriya-arthebhyaḥ—विषयों से; tasya—उसकी; prajñā—चेतना; pratiṣṭhitā—स्थिर।
जो अपनी इन्द्रियों को विषयों से उसी प्रकार समेट लेने में समर्थ है, जिस प्रकार कछुआ अपने अंगों को कवच के भीतर समेट लेता है, उसे यथार्थ रूप से ज्ञान में स्थित समझना चाहिए।
योगी, भक्त अथवा आत्म-साक्षात्कारी जीव की कसौटी यह है कि वह अपनी योजना के अनुसार इन्द्रियों को नियन्त्रित कर सकता है। किन्तु अधिकांश लोग इन्द्रियों के दास होते हैं और इस प्रकार इन्द्रियों के आदेश से संचालित होते हैं। योगी की स्थिति कैसी होती है, इस प्रश्न का यही उत्तर है। इन्द्रियों की तुलना विषैले सर्पों से की जाती है। वे अत्यन्त स्वच्छन्द रूप से और बिना किसी अंकुश के कार्य करना चाहती हैं। योगी अथवा भक्त को सर्पों को वश में रखने के लिए अत्यन्त सशक्त होना चाहिए—जैसे कोई सपेरा। वह उन्हें कभी स्वतन्त्र रूप से कार्य करने नहीं देता। प्रकट शास्त्रों में अनेक विधान हैं; उनमें से कुछ निषेधात्मक हैं और कुछ विधेयात्मक। जब तक मनुष्य इन विधि-निषेधों का पालन करते हुए स्वयं को इन्द्रियभोग से न रोके, तब तक कृष्णभावनामृत में दृढ़तापूर्वक स्थित होना सम्भव नहीं है। यहाँ प्रस्तुत सर्वोत्तम उदाहरण कछुए का है। कछुआ किसी भी क्षण अपनी इन्द्रियों को समेट सकता है और किसी विशेष प्रयोजन के लिए किसी भी समय उन्हें पुनः प्रकट कर सकता है। इसी प्रकार कृष्णभावनाभावित व्यक्तियों की इन्द्रियाँ भगवान् की सेवा में किसी विशेष प्रयोजन हेतु ही प्रयुक्त होती हैं और अन्यथा समेट ली जाती हैं। इन्द्रियों को सदा भगवान् की सेवा में रखना ही वह उदाहरण है, जो कछुए की उपमा से प्रस्तुत किया जाता है, जो अपनी इन्द्रियों को भीतर समेटे रखता है।