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अध्याय 2 · 58 / 71

2.59

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः ।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥ ५९ ॥

viṣayāḥ—इन्द्रियभोग के विषय; vinivartante—जिनसे विरत रहने का अभ्यास किया जाता है; nirāhārasya—निषेधात्मक संयमों द्वारा; dehinaḥ—देहधारी के लिए; rasa-varjam—रसास्वादन को त्यागकर; rasaḥ—भोग की भावना; api—यद्यपि रहती है; asya—उसकी; param—कहीं श्रेष्ठ वस्तुएँ; dṛṣṭvā—अनुभव करके; nivartate—विरत हो जाता है।

देहधारी जीव इन्द्रियभोग से विरत किया जा सकता है, यद्यपि विषयों के प्रति रसास्वादन बना रहता है। किन्तु एक उच्चतर रस का अनुभव करके ऐसी प्रवृत्तियों को त्याग देने पर, वह चेतना में स्थिर हो जाता है।

जब तक मनुष्य दिव्य रूप से स्थित न हो, तब तक इन्द्रियभोग से विरत होना सम्भव नहीं है। विधि-नियमों द्वारा इन्द्रियभोग से विरत रहने की प्रक्रिया कुछ-कुछ वैसी ही है, जैसे किसी रोगी को कुछ विशेष प्रकार के खाद्य पदार्थों से रोकना। किन्तु रोगी न तो ऐसे प्रतिबन्धों को पसन्द करता है, और न ही खाद्य पदार्थों के प्रति अपना रसास्वादन खोता है। इसी प्रकार अष्टांग-योग जैसी किसी आध्यात्मिक प्रक्रिया द्वारा यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान आदि के माध्यम से इन्द्रिय-संयम उन अल्पबुद्धि व्यक्तियों के लिए अनुशंसित है, जिनके पास इससे श्रेष्ठ कोई ज्ञान नहीं है। किन्तु जिसने कृष्णभावनामृत में अपनी उन्नति के क्रम में परमेश्वर श्रीकृष्ण के सौन्दर्य का रसास्वादन कर लिया है, उसे मृत भौतिक वस्तुओं में फिर कोई रस नहीं रहता। अतः जीवन की आध्यात्मिक उन्नति में अल्पबुद्धि नवदीक्षितों के लिए ये प्रतिबन्ध हैं, किन्तु ऐसे प्रतिबन्ध तभी हितकर हैं जब मनुष्य में वस्तुतः कृष्णभावनामृत के प्रति रस हो। जब मनुष्य वस्तुतः कृष्णभावनाभावित होता है, तब वह स्वतः ही फीकी वस्तुओं के प्रति अपना रस खो देता है।