अध्याय 2 · 59 / 71
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यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः ।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥ ६० ॥
yatataḥ—प्रयत्न करते हुए; hi—निश्चय ही; api—होते हुए भी; kaunteya—हे कुन्तीपुत्र; puruṣasya—मनुष्य की; vipaścitaḥ—विवेकपूर्ण ज्ञान से युक्त; indriyāṇi—इन्द्रियाँ; pramāthīni—उद्वेलित; haranti—बलपूर्वक हर ले जाती हैं; prasabhaṁ—बलपूर्वक; manaḥ—मन को।
हे अर्जुन! इन्द्रियाँ इतनी प्रबल एवं वेगवती हैं कि वे उस विवेकी मनुष्य के मन को भी, जो उन्हें वश में करने का प्रयत्न कर रहा होता है, बलपूर्वक हर ले जाती हैं।
अनेक विद्वान् ऋषि, दार्शनिक एवं अध्यात्मवादी इन्द्रियों को जीतने का प्रयत्न करते हैं, किन्तु अपने प्रयत्नों के होते हुए भी उनमें से महानतम भी कभी-कभी विचलित मन के कारण भौतिक इन्द्रियभोग के शिकार हो जाते हैं। यहाँ तक कि एक महान् ऋषि एवं पूर्ण योगी विश्वामित्र भी मेनका द्वारा यौनभोग की ओर भटका दिए गए, यद्यपि वह योगी कठोर तपस्या एवं योग-अभ्यास के द्वारा इन्द्रिय-संयम के लिए प्रयत्नशील थे। और निस्सन्देह संसार के इतिहास में ऐसे अनेक समान उदाहरण विद्यमान हैं। अतः पूर्णतः कृष्णभावनाभावित हुए बिना मन और इन्द्रियों को वश में करना अत्यन्त कठिन है। मन को श्रीकृष्ण में संलग्न किए बिना मनुष्य ऐसी भौतिक प्रवृत्तियों से विरत नहीं हो सकता। एक व्यावहारिक उदाहरण श्री यामुनाचार्य द्वारा दिया गया है, जो एक महान् सन्त एवं भक्त थे, और जो कहते हैं: “जब से मेरा मन भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमलों की सेवा में संलग्न हुआ है, और मैं एक नित्य नवीन दिव्य रस का आस्वादन करता रहा हूँ, तब से जब भी मैं किसी स्त्री के साथ यौन-जीवन का विचार करता हूँ, तो मेरा मुख तुरन्त उससे फिर जाता है, और मैं उस विचार पर थूकता हूँ।”
कृष्णभावनामृत इतनी दिव्य रूप से मनोहर वस्तु है कि भौतिक भोग स्वतः ही अरुचिकर हो जाता है। यह वैसा ही है, जैसे किसी भूखे मनुष्य ने पर्याप्त मात्रा में पौष्टिक खाद्य पदार्थों से अपनी भूख तृप्त कर ली हो। महाराज अम्बरीष ने भी एक महान् योगी, दुर्वासा मुनि, पर इसलिए विजय पाई, क्योंकि उनका मन कृष्णभावनामृत में संलग्न था।