अध्याय 2 · 7 / 71
2.7
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः
पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः ।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥ ७ ॥
कार्पण्य—कृपणतावश; दोष—दुर्बलता; उपहत—से ग्रस्त; स्वभावः—विशेषताएँ; पृच्छामि—मैं पूछ रहा हूँ; त्वाम्—आपसे; धर्म—धर्म; संमूढ—मोहित; चेताः—हृदय में; यत्—जो; श्रेयः—सर्वकल्याणकारी; स्यात्—हो; निश्चितम्—विश्वासपूर्वक; ब्रूहि—बताइए; तत्—वह; मे—मुझे; शिष्यः—शिष्य; ते—आपका; अहम्—मैं हूँ; शाधि—बस उपदेश दीजिए; माम्—मुझे; त्वाम्—आपके प्रति; प्रपन्नम्—शरणागत।
अब मैं अपने कर्तव्य के विषय में मोहित हूँ और दुर्बलता के कारण मैंने अपना समस्त धैर्य खो दिया है। इस अवस्था में मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि मेरे लिए जो श्रेयस्कर है, वह स्पष्ट रूप से मुझे बताइए। अब मैं आपका शिष्य तथा आपका शरणागत जीव हूँ। कृपया मुझे उपदेश दीजिए।
प्रकृति के अपने ही नियमानुसार भौतिक कर्मों की समूची व्यवस्था प्रत्येक व्यक्ति के लिए व्याकुलता का स्रोत है। पग-पग पर व्याकुलता है, और अतएव मनुष्य के लिए ऐसे प्रामाणिक गुरु की शरण में जाना उचित है, जो उसे जीवन के प्रयोजन को सम्पन्न करने हेतु समुचित मार्गदर्शन दे सके। समस्त वैदिक साहित्य हमें परामर्श देते हैं कि जीवन की उन व्याकुलताओं से मुक्त होने के लिए, जो हमारी इच्छा के बिना ही घटित होती हैं, हम किसी प्रामाणिक गुरु की शरण में जाएँ। वे उस दावानल के समान हैं, जो किसी के लगाए बिना ही किसी प्रकार धधक उठता है। इसी प्रकार, संसार की स्थिति ऐसी है कि जीवन की व्याकुलताएँ स्वतः प्रकट हो जाती हैं, बिना हमारे ऐसी उलझन की कामना किए। कोई अग्नि नहीं चाहता, फिर भी वह घटित होती है, और हम व्याकुल हो जाते हैं। अतः वैदिक प्रज्ञा परामर्श देती है कि जीवन की व्याकुलताओं को हल करने तथा उस समाधान के विज्ञान को समझने के लिए, मनुष्य को ऐसे गुरु की शरण में जाना चाहिए जो गुरु-परम्परा में स्थित हो। प्रामाणिक गुरु वाले व्यक्ति से यह अपेक्षा की जाती है कि वह सब कुछ जानता हो। अतएव मनुष्य को भौतिक व्याकुलताओं में नहीं रहना चाहिए, अपितु किसी गुरु की शरण में जाना चाहिए। यही इस श्लोक का तात्पर्य है।
भौतिक व्याकुलताओं में पड़ा हुआ मनुष्य कौन है? वह वही है जो जीवन की समस्याओं को नहीं समझता। गर्ग उपनिषद् में व्याकुल मनुष्य का वर्णन इस प्रकार किया गया है :
yo vā etad akṣaraṁ gārgy aviditvāsmāl lokāt praiti sa kṛpaṇaḥ
“वह कृपण मनुष्य है, जो मनुष्य के रूप में जीवन की समस्याओं को हल नहीं करता और इस प्रकार आत्म-साक्षात्कार के विज्ञान को समझे बिना ही, बिल्ली-कुत्तों के समान इस संसार को त्याग देता है।” यह मनुष्य-जीवन उस जीव के लिए सर्वाधिक मूल्यवान् सम्पत्ति है, जो इसका उपयोग जीवन की समस्याओं को हल करने में कर सकता है; अतः जो इस अवसर का समुचित उपयोग नहीं करता, वह कृपण है। दूसरी ओर, वह ब्राह्मण है, अथवा वह जो इस शरीर का उपयोग जीवन की समस्त समस्याओं को हल करने में करने योग्य बुद्धिमान् है।
कृपण, अथवा कंजूस व्यक्ति, जीवन की भौतिक धारणा में परिवार, समाज, देश आदि के प्रति अत्यधिक अनुराग में अपना समय व्यर्थ करते हैं। मनुष्य प्रायः पारिवारिक जीवन के प्रति, अर्थात् पत्नी, सन्तानों तथा अन्य सदस्यों के प्रति, “चर्मरोग” के आधार पर आसक्त रहता है। कृपण यह सोचता है कि वह अपने परिवारजनों को मृत्यु से बचाने में समर्थ है; अथवा कृपण यह सोचता है कि उसका परिवार अथवा समाज उसे मृत्यु के कगार से बचा सकता है। ऐसी पारिवारिक आसक्ति निम्नतर पशुओं में भी पाई जा सकती है, जो अपनी सन्तानों की भी देखभाल करते हैं। बुद्धिमान् होने के कारण, अर्जुन यह समझ सकते थे कि परिवारजनों के प्रति उनका स्नेह तथा उन्हें मृत्यु से बचाने की उनकी इच्छा ही उनकी व्याकुलताओं के कारण थे। यद्यपि वे यह समझ सकते थे कि युद्ध करने का उनका कर्तव्य उनकी प्रतीक्षा कर रहा था, तथापि कृपणतावश दुर्बलता के कारण वे उन कर्तव्यों का निर्वाह नहीं कर सके। अतएव वे भगवान् श्रीकृष्ण से, जो परम गुरु हैं, एक निश्चित समाधान करने की प्रार्थना कर रहे हैं। वे शिष्य के रूप में स्वयं को श्रीकृष्ण को अर्पित करते हैं। वे मैत्रीपूर्ण वार्ता को रोकना चाहते हैं। गुरु तथा शिष्य के मध्य की वार्ता गम्भीर होती है, और अब अर्जुन मान्य गुरु के समक्ष अत्यन्त गम्भीरता से बात करना चाहते हैं। अतएव श्रीकृष्ण भगवद्गीता के विज्ञान के मूल गुरु हैं, और अर्जुन गीता को समझने के लिए प्रथम शिष्य हैं। अर्जुन भगवद्गीता को किस प्रकार समझते हैं, यह स्वयं गीता में कहा गया है। फिर भी मूर्ख सांसारिक विद्वान् यह व्याख्या करते हैं कि मनुष्य को श्रीकृष्ण के समक्ष व्यक्ति-रूप में नहीं, अपितु “श्रीकृष्ण के भीतर के अजन्मा” के समक्ष समर्पण करना चाहिए। श्रीकृष्ण के भीतर तथा बाहर में कोई भेद नहीं है। और जिसे इस समझ का कोई बोध नहीं है, वह भगवद्गीता को समझने के प्रयास में सबसे बड़ा मूर्ख है।