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अध्याय 2 · 60 / 71

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तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः ।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ६१ ॥

tāni—उन इन्द्रियों को; sarvāṇi—समस्त; saṁyamya—वश में रखकर; yuktaḥ—संलग्न होकर; āsīta—स्थित होकर; mat-paraḥ—मेरे सम्बन्ध में; vaśe—पूर्ण वश में; hi—निश्चय ही; yasya—जिसकी; indriyāṇi—इन्द्रियाँ; tasya—उसकी; prajñā—चेतना; pratiṣṭhitā—स्थिर।

जो अपनी इन्द्रियों को संयमित करता है और अपनी चेतना को मुझमें स्थिर करता है, वह स्थिरबुद्धि मनुष्य कहलाता है।

इस श्लोक में स्पष्ट रूप से समझाया गया है कि योग-सिद्धि की उच्चतम धारणा कृष्णभावनामृत ही है। और जब तक मनुष्य कृष्णभावनाभावित न हो, तब तक इन्द्रियों को वश में करना तनिक भी सम्भव नहीं है। जैसा कि ऊपर उद्धृत किया गया, महान् ऋषि दुर्वासा मुनि ने महाराज अम्बरीष से झगड़ा मोल लिया, और दुर्वासा मुनि गर्व के कारण व्यर्थ ही क्रोधित हो गए और इसी कारण अपनी इन्द्रियों को वश में न रख सके। दूसरी ओर वह राजा, यद्यपि ऋषि के समान शक्तिशाली योगी नहीं था, किन्तु भगवान् का भक्त था, उसने ऋषि के समस्त अन्यायों को मौनपूर्वक सहन किया और इस प्रकार विजयी हुआ। राजा अपनी इन्द्रियों को इसलिए वश में रख सका, क्योंकि उसमें निम्नलिखित गुण विद्यमान थे, जैसा कि श्रीमद्भागवत में उल्लिखित है:

sa vai manaḥ kṛṣṇa-padāravindayor

vacāṁsi vaikuṇṭha-guṇānavarṇane

karau harer mandira-mārjanādiṣu

śrutiṁ cakārācyuta-sat-kathodaye

mukunda-liṅgālaya-darśane dṛśau

tad-bhṛtya-gātra-sparśe’ṅga-saṅgamam

ghrāṇaṁ ca tat-pāda-saroja-saurabhe

śrīmat-tulasyā rasanāṁ tad-arpite

pādau hareḥ kṣetra-padānusarpaṇe

śiro hṛṣīkeśa-padābhivandane

kāmaṁ ca dāsye na tu kāma-kāmyayā

yathottamaśloka-janāśrayā ratiḥ

“राजा अम्बरीष ने अपने मन को भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमलों में स्थिर किया, अपने वचनों को भगवान् के धाम का वर्णन करने में, अपने हाथों को भगवान् के मन्दिर के मार्जन में, अपने कानों को भगवान् की लीलाओं को सुनने में, अपने नेत्रों को भगवान् के रूप का दर्शन करने में, अपने शरीर को भक्त के शरीर का स्पर्श करने में, अपने नासिका-छिद्रों को भगवान् के चरणकमलों पर अर्पित पुष्पों की सुगन्ध सूँघने में, अपनी जिह्वा को भगवान् को अर्पित तुलसी-पत्रों का आस्वादन करने में, अपने चरणों को उस तीर्थ-स्थान की यात्रा में जहाँ उनका मन्दिर स्थित है, अपने मस्तक को भगवान् को प्रणाम अर्पित करने में, और अपनी इच्छाओं को भगवान् की इच्छाओं की पूर्ति में संलग्न किया… और इन समस्त गुणों ने उसे भगवान् का मत्परः भक्त बनने के योग्य बना दिया।” (भा. 9.4.18-20)

इस सन्दर्भ में मत्परः शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। मनुष्य किस प्रकार मत्परः बन सकता है, इसका वर्णन महाराज अम्बरीष के जीवन में किया गया है। मत्परः परम्परा के एक महान् विद्वान् एवं आचार्य श्रील बलदेव विद्याभूषण टिप्पणी करते हैं: “मद्भक्ति-प्रभावेन सर्वेन्द्रिय-विजय-पूर्विका स्वात्म दृष्टिः सुलभेति भावः।” “इन्द्रियों को पूर्णतः केवल श्रीकृष्ण की भक्ति के बल से ही वश में किया जा सकता है।” अग्नि का उदाहरण भी कभी-कभी दिया जाता है: “जिस प्रकार भीतर की छोटी ज्वालाएँ कक्ष के भीतर की प्रत्येक वस्तु को जला देती हैं, उसी प्रकार योगी के हृदय में स्थित भगवान् विष्णु समस्त प्रकार की अशुद्धियों को जला देते हैं।” योग-सूत्र भी विष्णु पर ध्यान का विधान करता है, न कि शून्य पर ध्यान का। जो तथाकथित योगी किसी ऐसी वस्तु पर ध्यान करते हैं, जो विष्णु-रूप नहीं है, वे किसी मायाजाल की व्यर्थ खोज में अपना समय नष्ट करते हैं। हमें कृष्णभावनाभावित होना है—भगवान् के प्रति समर्पित। यही यथार्थ योग का लक्ष्य है।