हि

अध्याय 2 · 61 / 71

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ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।
सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥ ६२ ॥

dhyayataḥ—चिन्तन करते हुए; viṣayān—विषयों का; puṁsaḥ—व्यक्ति की; saṅgaḥ—आसक्ति; teṣu—विषयों में; upajāyate—उत्पन्न होती है; saṅgāt—आसक्ति से; sañjāyate—उत्पन्न होता है; kāmaḥ—काम; kāmāt—काम से; krodhaḥ—क्रोध; abhijāyate—प्रकट होता है।

इन्द्रिय-विषयों का चिन्तन करते हुए मनुष्य में उनके प्रति आसक्ति उत्पन्न होती है, और ऐसी आसक्ति से काम जन्म लेता है, तथा काम से क्रोध उत्पन्न होता है।

जो कृष्णभावनाभावित नहीं है, वह इन्द्रिय-विषयों का चिन्तन करते हुए भौतिक इच्छाओं के अधीन हो जाता है। इन्द्रियों को यथार्थ कार्य की आवश्यकता होती है, और यदि वे भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा में संलग्न न हों, तो वे निश्चय ही भौतिकवाद की सेवा में संलग्नता ढूँढ़ेंगी। भौतिक जगत् में प्रत्येक प्राणी—भगवान् शिव एवं भगवान् ब्रह्मा सहित, स्वर्गलोक के अन्य देवताओं की तो बात ही क्या—इन्द्रिय-विषयों के प्रभाव के अधीन है, और भौतिक अस्तित्व की इस पहेली से बाहर निकलने का एकमात्र उपाय कृष्णभावनाभावित होना ही है। भगवान् शिव गहन ध्यान में लीन थे, किन्तु जब पार्वती ने इन्द्रिय-सुख के लिए उन्हें उद्वेलित किया, तब उन्होंने उस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया, और परिणामस्वरूप कार्तिकेय का जन्म हुआ। जब हरिदास ठाकुर भगवान् के एक युवा भक्त थे, तब वे भी इसी प्रकार माया देवी के अवतार द्वारा प्रलोभित किए गए, किन्तु भगवान् श्रीकृष्ण के प्रति अपनी अनन्य भक्ति के कारण हरिदास सहज ही उस परीक्षा में उत्तीर्ण हो गए। जैसा कि श्री यामुनाचार्य के उपर्युक्त श्लोक में दर्शाया गया है, भगवान् का एक निष्ठावान् भक्त भगवान् की संगति में आध्यात्मिक भोग के प्रति अपने उच्चतर रस के कारण समस्त भौतिक इन्द्रियभोग से दूर रहता है। यही सफलता का रहस्य है। अतः जो कृष्णभावनामृत में नहीं है, वह कृत्रिम दमन द्वारा इन्द्रियों को वश में करने में कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो, अन्ततः निश्चित रूप से असफल होगा, क्योंकि इन्द्रिय-सुख का तनिक-सा विचार भी उसे अपनी इच्छाओं की तृप्ति के लिए उद्वेलित कर देगा।