अध्याय 2 · 62 / 71
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क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥ ६३ ॥
krodhāt—क्रोध से; bhavati—होता है; saṁmohaḥ—पूर्ण मोह; saṁmohāt—मोह से; smṛti—स्मृति की; vibhramaḥ—विभ्रम; smṛti-bhraṁśāt—स्मृति के विभ्रम के पश्चात्; buddhi-nāśaḥ—बुद्धि का नाश; buddhi-nāśāt—और बुद्धि के नाश से; praṇaśyati—पतित हो जाता है।
क्रोध से मोह उत्पन्न होता है, और मोह से स्मृति का विभ्रम होता है। जब स्मृति विभ्रमित होती है, तब बुद्धि का नाश हो जाता है, और जब बुद्धि का नाश हो जाता है, तब मनुष्य पुनः भौतिक भवसागर में गिर जाता है।
कृष्णभावनामृत के विकास द्वारा मनुष्य यह जान सकता है कि प्रत्येक वस्तु का भगवान् की सेवा में उपयोग है। जो कृष्णभावनामृत के ज्ञान से रहित हैं, वे कृत्रिम रूप से भौतिक विषयों से बचने का प्रयत्न करते हैं, और परिणामस्वरूप, यद्यपि वे भौतिक बन्धन से मुक्ति की कामना करते हैं, फिर भी वे त्याग की पूर्ण अवस्था को प्राप्त नहीं होते। दूसरी ओर, कृष्णभावनाभावित व्यक्ति जानता है कि प्रत्येक वस्तु का भगवान् की सेवा में किस प्रकार उपयोग किया जाए; अतः वह भौतिक चेतना का शिकार नहीं होता। उदाहरणार्थ, निर्विशेषवादी के लिए भगवान्, अथवा परम सत्य, निराकार होने के कारण भोजन नहीं कर सकते। जहाँ निर्विशेषवादी उत्तम खाद्य पदार्थों से बचने का प्रयत्न करता है, वहीं भक्त जानता है कि श्रीकृष्ण परम भोक्ता हैं और वे उस सब को ग्रहण करते हैं, जो उन्हें भक्तिपूर्वक अर्पित किया जाता है। अतः भगवान् को उत्तम खाद्य पदार्थ अर्पित करने के पश्चात् भक्त अवशिष्ट भाग ग्रहण करता है, जिसे प्रसादम् कहा जाता है। इस प्रकार प्रत्येक वस्तु आध्यात्मीकृत हो जाती है और पतन का कोई भय नहीं रहता। भक्त कृष्णभावनामृत में प्रसादम् ग्रहण करता है, जबकि अभक्त उसे भौतिक मानकर अस्वीकार कर देता है। अतः निर्विशेषवादी अपने कृत्रिम त्याग के कारण जीवन का आनन्द नहीं ले सकता; और इसी कारण मन का तनिक-सा उद्वेलन उसे पुनः भौतिक अस्तित्व के भवसागर में नीचे खींच लेता है। कहा जाता है कि ऐसा जीव, मुक्ति के बिन्दु तक उठ जाने पर भी, भक्ति में आधार न होने के कारण पुनः नीचे गिर जाता है।