हि

अध्याय 2 · 63 / 71

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रागद्वेषविमुक्तैस्तु विषयनिन्द्रियैश्चरन् ।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥ ६४ ॥

rāga—आसक्ति; dveṣa—अनासक्ति; vimuktaiḥ—जो इन वस्तुओं से मुक्त हो गया है, उसके द्वारा; tu—किन्तु; viṣayān—विषयों का; indriyaiḥ—इन्द्रियों द्वारा; caran—कार्य करते हुए; ātma-vaśyaiḥ—जिसका वश में नियन्त्रण है; vidheyātmā—जो नियमित स्वतन्त्रता का पालन करता है; prasādam—भगवान् की कृपा; adhigacchati—प्राप्त करता है।

जो स्वतन्त्रता के नियमित सिद्धान्तों का अभ्यास करके अपनी इन्द्रियों को वश में कर सकता है, वह भगवान् की पूर्ण कृपा प्राप्त कर सकता है और इस प्रकार समस्त आसक्ति एवं द्वेष से मुक्त हो सकता है।

पहले ही समझाया जा चुका है कि मनुष्य बाहरी रूप से किसी कृत्रिम प्रक्रिया द्वारा इन्द्रियों को वश में कर सकता है, किन्तु जब तक इन्द्रियाँ भगवान् की दिव्य सेवा में संलग्न न हों, तब तक पतन की पूर्ण सम्भावना रहती है। यद्यपि पूर्णतः कृष्णभावनाभावित व्यक्ति बाह्य रूप से इन्द्रिय-स्तर पर प्रतीत हो सकता है, किन्तु कृष्णभावनाभावित होने के कारण उसकी ऐन्द्रिय क्रियाओं में कोई आसक्ति नहीं होती। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति का सरोकार केवल श्रीकृष्ण की तृप्ति से है, और किसी अन्य वस्तु से नहीं। अतः वह समस्त आसक्ति से परे है। यदि श्रीकृष्ण चाहें, तो भक्त ऐसा कोई भी कार्य कर सकता है, जो सामान्यतः अवांछनीय हो; और यदि श्रीकृष्ण न चाहें, तो वह वह कार्य नहीं करेगा, जो उसने सामान्यतः अपनी तृप्ति के लिए किया होता। अतः कार्य करना अथवा न करना उसके वश में है, क्योंकि वह केवल श्रीकृष्ण के निर्देशन में ही कार्य करता है। यह चेतना भगवान् की अहैतुकी कृपा है, जिसे भक्त इन्द्रिय-स्तर के प्रति आसक्त रहते हुए भी प्राप्त कर सकता है।