हि

अध्याय 2 · 64 / 71

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प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥ ६५ ॥

prasāde—भगवान् की अहैतुकी कृपा की प्राप्ति पर; sarva—समस्त; duḥkhānām—भौतिक दुःखों का; hāniḥ—विनाश; asya—उसका; upajāyate—होता है; prasanna-cetasaḥ—प्रसन्नचित्त का; hi—निश्चय ही; āśu—अति शीघ्र; buddhiḥ—बुद्धि; pari—पर्याप्त रूप से; avatiṣṭhate—स्थापित हो जाती है।

जो इस प्रकार दिव्य चेतना में स्थित है, उसके लिए भौतिक अस्तित्व के त्रिविध दुःख और नहीं रहते; ऐसी प्रसन्न अवस्था में मनुष्य की बुद्धि शीघ्र ही स्थिर हो जाती है।