अध्याय 2 · 65 / 71
2.66
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना ।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ॥ ६६ ॥
na asti—नहीं हो सकती; buddhiḥ—दिव्य बुद्धि; ayuktasya—उसकी जो (कृष्णभावनामृत से) संयुक्त नहीं है; na—न; ca—और; ayuktasya—कृष्णभावनामृत से रहित व्यक्ति की; bhāvanā—सुख में स्थिर मन; na—न; ca—और; abhāvayataḥ—जो स्थिर नहीं है; śāntiḥ—शान्ति; aśāntasya—अशान्त की; kutaḥ—कहाँ है; sukham—सुख।
जो दिव्य चेतना में नहीं है, उसके पास न तो नियन्त्रित मन हो सकता है और न स्थिर बुद्धि, और इनके बिना शान्ति की कोई सम्भावना नहीं है। और शान्ति के बिना सुख कैसे हो सकता है?
जब तक मनुष्य कृष्णभावनामृत में न हो, तब तक शान्ति की कोई सम्भावना नहीं है। अतः पाँचवें अध्याय (5.29) में इसकी पुष्टि होती है कि जब मनुष्य यह समझ लेता है कि यज्ञ एवं तपस्या के समस्त उत्तम फलों के एकमात्र भोक्ता श्रीकृष्ण ही हैं, और वे समस्त विश्व-प्रकटीकरणों के स्वामी हैं, तथा वे समस्त जीवों के यथार्थ मित्र हैं, तभी मनुष्य यथार्थ शान्ति प्राप्त कर सकता है। अतः यदि मनुष्य कृष्णभावनामृत में नहीं है, तो मन के लिए कोई अन्तिम लक्ष्य नहीं हो सकता। अशान्ति अन्तिम लक्ष्य के अभाव के कारण होती है, और जब मनुष्य को यह निश्चय हो जाता है कि श्रीकृष्ण ही प्रत्येक प्राणी एवं प्रत्येक वस्तु के भोक्ता, स्वामी एवं मित्र हैं, तब वह स्थिर मन से शान्ति स्थापित कर सकता है। अतएव जो श्रीकृष्ण के साथ सम्बन्ध के बिना संलग्न है, वह जीवन में शान्ति एवं आध्यात्मिक उन्नति का कितना ही प्रदर्शन क्यों न करे, निश्चय ही सदा क्लेश में रहता है और शान्ति से रहित रहता है। कृष्णभावनामृत एक स्वयंप्रकट शान्तिपूर्ण अवस्था है, जिसे केवल श्रीकृष्ण के साथ सम्बन्ध में ही प्राप्त किया जा सकता है।