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अध्याय 2 · 66 / 71

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इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते ।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥ ६७ ॥

indriyāṇām—इन्द्रियों की; hi—निश्चय ही; caratām—विचरण करती हुई; yat—जो; manaḥ—मन; anuvidhīyate—निरन्तर संलग्न हो जाता है; tat—वह; asya—उसकी; harati—हर ले जाती है; prajñām—बुद्धि को; vāyuḥ—वायु; nāvam—नौका; iva—के समान; ambhasi—जल पर।

जिस प्रकार जल पर तैरती नौका को प्रचण्ड वायु बहा ले जाती है, उसी प्रकार जिस एक भी इन्द्रिय पर मन केन्द्रित होता है, वह मनुष्य की बुद्धि को हर ले जा सकती है।

जब तक समस्त इन्द्रियाँ भगवान् की सेवा में संलग्न न हों, तब तक उनमें से एक भी, जो इन्द्रियतृप्ति में संलग्न हो, भक्त को दिव्य उन्नति के मार्ग से विचलित कर सकती है। जैसा कि महाराज अम्बरीष के जीवन में उल्लिखित है, समस्त इन्द्रियों को कृष्णभावनामृत में संलग्न होना चाहिए, क्योंकि मन को वश में करने की यही उचित विधि है।