अध्याय 2 · 67 / 71
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तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ६८ ॥
tasmāt—अतः; yasya—जिसकी; mahā-bāho—हे महाबाहु; nigṛhītāni—इस प्रकार वश में की गई; sarvaśaḥ—सर्वतोभावेन; indriyāṇi—इन्द्रियाँ; indriya-arthebhyaḥ—विषयों से; tasya—उसकी; prajñā—बुद्धि; pratiṣṭhitā—स्थिर।
अतः हे महाबाहु! जिसकी इन्द्रियाँ अपने विषयों से संयमित हैं, वह निश्चय ही स्थिरबुद्धि है।
जिस प्रकार शत्रु श्रेष्ठ बल द्वारा वश में किए जाते हैं, उसी प्रकार इन्द्रियाँ किसी मानवीय प्रयत्न द्वारा नहीं, अपितु केवल उन्हें भगवान् की सेवा में संलग्न रखकर ही वश में की जा सकती हैं। जिसने यह समझ लिया है—कि केवल कृष्णभावनामृत द्वारा ही मनुष्य वास्तव में बुद्धि में स्थित होता है, और इस कला का अभ्यास प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु के निर्देशन में करना चाहिए—वह साधक कहलाता है, अर्थात् मुक्ति का उपयुक्त अधिकारी।