अध्याय 2 · 8 / 71
2.8
न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद् -
यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् ।
अवाप्य भूभावसपत्नमृद्धं
राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥ ८ ॥
न—नहीं; हि—निश्चय ही; प्रपश्यामि—मुझे दिखाई देता है; मम—मेरा; अपनुद्यात्—वे दूर कर सकें; यत्—जो; शोकम्—शोक; उच्छोषणम्—सुखा देने वाला; इन्द्रियाणाम्—इन्द्रियों का; अवाप्य—प्राप्त करके; भूमौ—पृथ्वी पर; असपत्नम्—प्रतिद्वन्द्वी रहित; ऋद्धम्—समृद्ध; राज्यम्—राज्य; सुराणाम्—देवताओं का; अपि—भी; च—भी; आधिपत्यम्—आधिपत्य।
मुझे ऐसा कोई उपाय नहीं दिखता जो इस शोक को दूर कर सके, जो मेरी इन्द्रियों को सुखा रहा है। यदि मैं स्वर्ग के देवताओं के समान सार्वभौम सत्ता वाला, प्रतिद्वन्द्वी रहित राज्य पृथ्वी पर जीत भी लूँ, तब भी मैं इसे नष्ट नहीं कर पाऊँगा।
यद्यपि अर्जुन धर्म तथा नैतिक विधानों के सिद्धान्तों के ज्ञान पर आधारित अनेक तर्क प्रस्तुत कर रहे थे, तथापि ऐसा प्रतीत होता है कि वे गुरु भगवान् श्रीकृष्ण की सहायता के बिना अपनी वास्तविक समस्या को हल करने में असमर्थ थे। वे यह समझ सकते थे कि उनकी तथाकथित विद्या उन समस्याओं को दूर करने में निरर्थक थी, जो उनके समूचे अस्तित्व को सुखा रही थीं; और भगवान् श्रीकृष्ण जैसे गुरु की सहायता के बिना ऐसी व्याकुलताओं को हल करना उनके लिए असम्भव था। शैक्षणिक ज्ञान, विद्वत्ता, उच्च पद आदि—ये सब जीवन की समस्याओं को हल करने में निरर्थक हैं; सहायता तो केवल श्रीकृष्ण जैसे गुरु ही दे सकते हैं। अतएव निष्कर्ष यह है कि जो गुरु शत-प्रतिशत कृष्णभावनामृत में स्थित है, वही प्रामाणिक गुरु है, क्योंकि वही जीवन की समस्याओं को हल कर सकता है। भगवान् चैतन्य ने कहा कि जो कृष्णभावनामृत के विज्ञान में निपुण है, उसके सामाजिक पद का विचार किए बिना, वही वास्तविक गुरु है।
kibāvipra, kibā nyāsī, śūdra kene naya
yei kṛṣṇa-tattva-vettā, sei ‘guru’ haya.
(चैतन्य-चरितामृत, मध्य 8.127)
“इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता कि कोई व्यक्ति विप्र [वैदिक प्रज्ञा का विद्वान्] है, अथवा निम्नतर कुल में जन्मा है, अथवा संन्यास-आश्रम में है—यदि वह श्रीकृष्ण के विज्ञान में निपुण है, तो वह पूर्ण तथा प्रामाणिक गुरु है।” अतः कृष्णभावनामृत के विज्ञान में निपुण हुए बिना कोई भी प्रामाणिक गुरु नहीं है। वैदिक साहित्य में यह भी कहा गया है :
ṣaṭ-karma-nipuṇo vipro mantra-tantra-viśāradaḥ
avaiṣṇavo gurur na syād vaiṣṇavaḥ śvapaco guruḥ
“वैदिक ज्ञान के समस्त विषयों में निपुण विद्वान् ब्राह्मण भी, वैष्णव अथवा कृष्णभावनामृत के विज्ञान में निपुण हुए बिना, गुरु बनने के अयोग्य है। किन्तु निम्न जाति के कुल में जन्मा व्यक्ति भी, यदि वह वैष्णव अथवा कृष्णभावनाभावित है, तो गुरु बन सकता है।”
भौतिक अस्तित्व की समस्याएँ—जन्म, वृद्धावस्था, रोग तथा मृत्यु—धन-संचय तथा आर्थिक विकास से दूर नहीं की जा सकतीं। संसार के अनेक भागों में ऐसे राज्य हैं जो जीवन की समस्त सुविधाओं से परिपूर्ण हैं, जो धन से भरे हैं, और आर्थिक रूप से विकसित हैं, फिर भी भौतिक अस्तित्व की समस्याएँ अब भी विद्यमान हैं। वे भिन्न-भिन्न रीतियों से शान्ति खोज रहे हैं, किन्तु वे वास्तविक सुख तभी प्राप्त कर सकते हैं, यदि वे श्रीकृष्ण से, अथवा भगवद्गीता एवं श्रीमद्भागवत से—जो श्रीकृष्ण का विज्ञान हैं—अथवा श्रीकृष्ण के प्रामाणिक प्रतिनिधि, कृष्णभावनाभावित मनुष्य से परामर्श करें।
यदि आर्थिक विकास तथा भौतिक सुख-सुविधाएँ पारिवारिक, सामाजिक, राष्ट्रीय अथवा अन्तर्राष्ट्रीय व्यसनों के लिए मनुष्य के शोक को दूर कर सकते, तो अर्जुन यह न कहते कि पृथ्वी पर प्रतिद्वन्द्वी रहित राज्य अथवा स्वर्गलोक के देवताओं के समान सार्वभौम सत्ता भी उनके शोक को दूर नहीं कर सकती। अतएव उन्होंने कृष्णभावनामृत में शरण ली, और शान्ति तथा सामञ्जस्य के लिए वही उचित मार्ग है। आर्थिक विकास अथवा संसार पर आधिपत्य भौतिक प्रकृति की प्रलयंकारी घटनाओं द्वारा किसी भी क्षण समाप्त किया जा सकता है। उच्चतर लोक-स्थिति में उन्नति भी, जैसे मनुष्य अब चन्द्रलोक पर स्थान खोज रहे हैं, एक ही प्रहार में समाप्त की जा सकती है। भगवद्गीता इसकी पुष्टि करती है : क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति “जब पुण्य कर्मों के फल समाप्त हो जाते हैं, तब मनुष्य पुनः सुख के शिखर से जीवन की निम्नतम स्थिति में गिर जाता है।” संसार के अनेक राजनेता इसी प्रकार पतित हुए हैं। ऐसे पतन तो शोक के और अधिक कारण ही बनते हैं।
अतएव यदि हम शोक को सदा के लिए रोकना चाहते हैं, तो हमें श्रीकृष्ण की शरण लेनी होगी, जैसा अर्जुन करना चाह रहे हैं। अतः अर्जुन ने श्रीकृष्ण से अपनी समस्या का निश्चित समाधान करने की प्रार्थना की, और यही कृष्णभावनामृत का मार्ग है।